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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

Page 47 of 675

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४६ * गीता-संग्रह *


पाँचवाँ अध्याय

योगवृत्तिकी प्रशंसा

श्रीगजानन उवाच

श्रौतस्मार्तानि कर्माणि फलं नेच्छन् समाचरेत्।
शस्तः स योगी राजेन्द्र अक्रियायोगमाश्रितात्॥ १॥

श्रीगणेशजी बोले—हे राजन्! जो श्रुति और स्मृतिमें कहे हुए कर्मोंको फलकी इच्छा न करके करता है, वह योगी कर्मका त्याग करनेवाले योगियोंसे श्रेष्ठ है॥ १॥

योगप्राप्त्यै महाबाहो हेतुः कर्मैव मे मतम्।
सिद्धियोगस्य संसिद्धयै हेतुः शमदमौ मतौ॥ २॥

हे महाभुज! मेरे मतमें योगप्राप्तिके निमित्त कर्म ही कारण है, योगसिद्धिकी सिद्धिके निमित्त शम और दम ही कारण हैं॥ २॥

इन्द्रियार्थांश्च सङ्कल्प्य कुर्वन् स्वस्य रिपुर्भवेत्।
एताननिच्छन् यः कुर्वन् सिद्धिं योगी च सिद्ध्यति॥ ३॥

इन्द्रियोंके विषयोंका संकल्पकर कर्म करनेवाला अपना शत्रु होता है और जो इनकी इच्छा न कर कर्म करता है, वही योगी सिद्धिको प्राप्त होता है॥ ३॥

सुहृत्त्वे च रिपुत्वे च उद्धारे चैव बन्धने।
आत्मनैवात्मनो ह्यात्मा नात्मा भवति कश्चन॥ ४॥

एकमात्र आत्मा ही आत्माका मित्र और शत्रु है, यही ज्ञान होनेसे उद्धार करता है और यही अज्ञान होनेसे बन्धनमें डालता है, दूसरा कोई नहीं॥ ४॥

मानेऽपमाने दुःखे च सुखे सुहृदि साधुषु।
मित्रेऽमित्रेऽप्युदासीने द्वेष्ये लोष्ठे च काञ्चने॥ ५॥