Skip to content
SarvaKosh
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

Page 428 of 675

Read in context
Page 428

* रामगीता ( २ ) * ४२७


रामोऽहं लक्ष्मणो ह्येष शत्रुघ्नो भरतोऽपि च।
चतुर्धा सम्भूतोऽहं कथितं तेऽनिलात्मज॥५०॥
मैंने ही राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न—इन चार रूपोंमें जन्म लिया है। हे पवनात्मज! यह मैंने तुम्हें बता दिया॥५०॥

मायास्वरूपं च तव कथितं यत्प्लवङ्गम।
कृपया तद्धृदा धार्यं न विस्मर्त्तव्यमेव हि॥५१॥
हे वानरश्रेष्ठ! मायास्वरूप भी मैंने तुम्हें कृपापूर्वक बताया है। इसे हृदयमें धारण करना और कभी भूलना मत॥५१॥

येनायं पठ्यते नित्यं संवादो भवतो मम।
जीवन्मुक्तो भवेत्सोऽपि सर्वपापैः प्रमुच्यते॥५२॥
जो मेरे-तुम्हारे इस संवादको नित्य पढ़ता है, वह जीवन्मुक्त होकर सभी पापोंसे छूट जाता है॥५२॥

श्रावयेद्वा द्विजाञ्छुद्धान् ब्रह्मचर्यपरायणान्।
यो वा विचारयेदर्थं स याति परमां गतिम्॥५३॥
जो इसे ब्रह्मचारी, शुद्धचित्त ब्राह्मणोंको सुनाता है या जो इसके अर्थका चिन्तन-मनन करता है, वह परमगतिको प्राप्त करता है॥५३॥

यश्चैतच्छृणुयान्नित्यं भक्तियुक्तो दृढव्रतः।
सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते॥५४॥
जो इसे नियमपूर्वक भक्तिभावसे नित्य सुनता है, वह सभी पापोंसे रहित होकर ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है॥५४॥

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन पठितव्यो मनीषिभिः।
श्रोतव्यश्चापि मन्तव्यो विशेषाद् ब्राह्मणैः सदा॥५५॥
इसलिये बुद्धिमान् लोगोंको विशेषकर ब्रह्मपरायणजनोंको पूरा प्रयत्न करके इसे पढ़ना-सुनना चाहिये और इसपर सदा मनन करना चाहिये॥५५॥

॥ इति श्रीअद्भुतरामायणे रामगीतायां चतुर्थोऽध्यायः॥
॥ रामगीता सम्पूर्णा॥