गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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प्रदान करता है, उसी प्रकार शुद्ध हृदयसे किये हुए पुण्यका फल अधिक होता है॥२॥
पापं चापि तथैव स्यात् पापेन मनसा कृतम्।
पुरोधाय मनो हीदं कर्मण्यात्मा प्रवर्तते॥ ३॥
इसी तरह कलुषित चित्तसे किये हुए पापके फलमें भी वृद्धि होती है; क्योंकि जीवात्मा मनको आगे करके ही प्रत्येक कार्यमें प्रवृत्त होता है॥ ३॥
यथा कर्मसमाविष्टः काममन्युसमावृतः।
नरो गर्भं प्रविशति तच्चापि शृणु चोत्तरम्॥ ४॥
काम-क्रोधसे घिरा हुआ मनुष्य जिस प्रकार कर्मजालमें आबद्ध होकर गर्भमें प्रवेश करता है, उसका भी उत्तर सुनो॥ ४॥
शुक्रं शोणितसंसृष्टं स्त्रिया गर्भाशयं गतम्।
क्षेत्रं कर्मजमाप्नोति शुभं वा यदि वाशुभम्॥ ५॥
जीव पहले पुरुषके वीर्यमें प्रविष्ट होता है, फिर स्त्रीके गर्भाशयमें जाकर उसके रजमें मिल जाता है। तत्पश्चात् उसे कर्मानुसार शुभ या अशुभ शरीरकी प्राप्ति होती है॥ ५॥
सौक्ष्म्यादव्यक्तभावाच्च न च क्वचन सज्जति।
सम्प्राप्य ब्रह्मणः कामं तस्मात् तद् ब्रह्म शाश्वतम्॥ ६॥
जीव अपनी इच्छाके अनुसार उस शरीरमें प्रवेश करके सूक्ष्म और अव्यक्त होनेके कारण कहीं आसक्त नहीं होता है; क्योंकि वास्तवमें वह सनातन परब्रह्मस्वरूप है॥ ६॥
तद् बीजं सर्वभूतानां तेन जीवन्ति जन्तवः।
स जीवः सर्वगात्राणि गर्भस्याविश्य भागशः॥ ७॥
दधाति चेतसा सद्यः प्राणस्थानेष्ववस्थितः।
ततः स्पन्दयतेऽङ्गानि च गर्भश्चेतनान्वितः॥ ८॥
वह जीवात्मा सम्पूर्ण भूतोंकी स्थितिका हेतु है, क्योंकि उसीके