गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- उत्तरगीता * ३५५
न च तत्रापि सन्तोषो दृष्ट्वा दीप्ततरां श्रियम्।
इत्येता गतयः सर्वाः पृथक्ते समुदीरिताः॥ ४१॥
वहाँ भी दूसरोंका अपनेसे बहुत अधिक दीप्तिमान् तेज एवं ऐश्वर्य देखकर मनमें सन्तोष नहीं होता है। इस प्रकार जीवकी इन सभी गतियोंका मैंने तुम्हारे समक्ष पृथक्-पृथक् वर्णन किया है॥ ४१॥
उपपत्तिं तु वक्ष्यामि गर्भस्याहमतः परम्।
तथा तन्मे निगदतः शृणुष्वावहितो द्विज॥ ४२॥
अब मैं यह बतलाऊँगा कि जीव किस प्रकार गर्भमें आकर जन्म धारण करता है। ब्रह्मन्! तुम एकाग्रचित्त होकर मेरे मुखसे इस विषयका वर्णन सुनो॥ ४२॥
॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि उत्तरगीतायां द्वितीयोऽध्यायः॥ २ ॥
तीसरा अध्याय
जीवके गर्भ-प्रवेश, आचार-धर्म, कर्म-फलकी अनिवार्यता तथा संसारसे तरनेके उपायका वर्णन
ब्राह्मण उवाच
शुभानामशुभानां च नेह नाशोऽस्ति कर्मणाम्।
प्राप्य प्राप्यानुपच्यन्ते क्षेत्रं क्षेत्रं तथा तथा॥ १॥
सिद्ध ब्राह्मण बोले— काश्यप! इस लोकमें किये हुए शुभ और अशुभ कर्मोंका फल भोगे बिना नाश नहीं होता। वे कर्म वैसा-वैसा कर्मानुसार एकके बाद एक शरीर धारण कराकर अपना फल देते रहते हैं॥ १॥
यथा प्रसूयमानस्तु फली दद्यात् फलं बहु।
तथा स्याद् विपुलं पुण्यं शुद्धेन मनसा कृतम्॥ २॥
जैसे फल देनेवाला वृक्ष फलनेका समय आनेपर बहुत-से फल