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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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Page 358
  • उत्तरगीता * ३५७

द्वारा सब प्राणी जीवित रहते हैं। वह जीव गर्भके समस्त अंगमें प्रविष्ट हो उसके प्रत्येक अंशमें तत्काल चेतनता ला देता है और वही प्राणोंके स्थान—वक्षःस्थलमें स्थित हो समस्त अंगोंका संचालन करता है। तभी वह गर्भ चेतनासे सम्पन्न होता है॥७-८॥

यथा लोहस्य निःस्यन्दो निषिक्तो बिम्बविग्रहम्।
उपैति तद् विजानीहि गर्भे जीवप्रवेशनम्॥ ९॥

जैसे तपाये हुए लोहेका द्रव्य जिस प्रकारके साँचेमें ढाला जाता है, उसीका रूप धारण कर लेता है, उसी प्रकार गर्भमें जीवका प्रवेश होता है, ऐसा समझो। (अर्थात् जीव जिस प्रकारकी योनिमें प्रविष्ट होता है, उसी रूपमें उसका शरीर बन जाता है)॥९॥

लोहपिण्डं यथा वह्निः प्रविश्य ह्यतितापयेत्।
तथा त्वमपि जानीहि गर्भे जीवोपपादनम्॥१०॥

जैसे आग लोहपिण्डमें प्रविष्ट होकर उसे बहुत तपा देती है, उसी प्रकार गर्भमें जीवका प्रवेश होता है और वह उसमें चेतनता ला देता है। इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो॥१०॥

यथा च दीपः शरणे दीप्यमानः प्रकाशते।
एवमेव शरीराणि प्रकाशयति चेतना॥११॥

जिस प्रकार जलता हुआ दीपक समूचे घरमें प्रकाश फैलाता है, उसी प्रकार जीवकी चैतन्य शक्ति शरीरके सब अवयवोंको प्रकाशित करती है॥११॥

यद् यच्च कुरुते कर्म शुभं वा यदि वाशुभम्।
पूर्वदेहकृतं सर्वमवश्यमुपभुज्यते॥ १२॥

मनुष्य शुभ अथवा अशुभ जो-जो कर्म करता है, पूर्वजन्मके शरीरसे किये गये उन सब कर्मोंका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है॥१२॥