गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
Page 355 of 675
Read in context३५४
- गीता-संग्रह *
तस्मात् सुदुर्लभो मोक्षो रक्ष्यश्चात्मा ततो भृशम्॥ ३६॥
यहीं पाप करनेवाले मानव अपने कर्मोंके अनुसार नरकमें पड़ते हैं। यह जीवकी अधोगति है, जो घोर कष्ट देनेवाली है। इसमें पड़कर पापी मनुष्य नरकाग्निमें पकाये जाते हैं। उससे छुटकारा मिलना बहुत कठिन है। अतः (पापकर्मसे दूर रहकर) अपनेको नरकसे बचाये रखनेका विशेष प्रयत्न करना चाहिये॥ ३६॥
ऊर्ध्वं तु जन्तवो गत्वा येषु स्थानेष्ववस्थिताः।
कीर्त्यमानानि तानीह तत्त्वतः सन्निबोध मे॥ ३७॥
स्वर्ग आदिके ऊर्ध्वलोकोंको जाकर प्राणी जिन स्थानोंमें निवास करते हैं, उनका यहाँ वर्णन किया जाता है, इस विषयको यथार्थरूपसे मुझसे सुनो॥ ३७॥
तच्छ्रुत्वा नैष्ठिकीं बुद्धिं बुद्धयेथाः कर्मनिश्चयम्।
तारारूपाणि सर्वाणि यत्रैतच्चन्द्रमण्डलम्॥ ३८॥
यत्र विभ्राजते लोके स्वभासा सूर्यमण्डलम्।
स्थानान्येतानि जानीहि जनानां पुण्यकर्मणाम्॥ ३९॥
इसको सुननेसे तुम्हें कर्मोंकी गतिका निश्चय हो जायगा और नैष्ठिकी बुद्धि प्राप्त होगी। जहाँ ये समस्त तारे हैं, जहाँ वह चन्द्रमण्डल प्रकाशित होता है और जहाँ सूर्यमण्डल जगत्में अपनी प्रभासे उद्भासित हो रहा है, ये सब-के-सब पुण्यकर्मा पुरुषोंके स्थान हैं, ऐसा जानो [पुण्यात्मा मनुष्य उन्हीं लोकोंमें जाकर अपने पुण्योंका फल भोगते हैं]॥ ३८-३९॥
कर्मक्षयाच्च ते सर्वे च्यवन्ते वै पुनः पुनः।
तत्रापि च विशेषोऽस्ति दिवि नीचोच्चमध्यमः॥ ४०॥
जब जीवोंके पुण्यकर्मोंका भोग समाप्त हो जाता है, तब वे वहाँसे नीचे गिरते हैं। इस प्रकार बारम्बार उनका आवागमन होता रहता है। स्वर्गमें भी उत्तम, मध्यम और अधमका भेद रहता है॥ ४०॥