गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- उत्तरगीता * | ३५१
ही वेदनाका अनुभव करता है। मृत्युकालमें जीवोंके शरीरकी सन्धियाँ टूटने लगती हैं और जन्मके समय वह गर्भस्थ जलसे भींगकर अत्यन्त व्याकुल हो उठता है॥ १९-२०॥
यथा पञ्चसु भूतेषु सम्भूतत्वं नियच्छति।
शैत्यात् प्रकुपितः काये तीव्रवायुसमीरितः॥ २१ ॥
यः स पञ्चसु भूतेषु प्राणापाने व्यवस्थितः।
स गच्छत्यूर्ध्वगो वायुः कृच्छ्रान्मुक्त्वा शरीरिणः॥ २२ ॥
अन्य प्रकारकी तीव्र वायुसे प्रेरित हो शरीरमें सर्दीसे कुपित हुई जो वायु पाँचों भूतोंमें प्राण और अपानके स्थानमें स्थित है, वही पंचभूतोंके संघातका नाश करती है तथा वह देहधारियोंको बड़े कष्टसे त्यागकर ऊर्ध्वलोकको चली जाती है॥ २१-२२॥
शरीरं च जहात्येवं निरुच्छ्वासश्च दृश्यते।
स निरूष्मा निरुच्छ्वासो निःश्रीको हतचेतनः॥ २३ ॥
ब्रह्मणा सम्परित्यक्तो मृत इत्युच्यते नरैः।
इस प्रकार जब जीव शरीरका त्याग करता है, तब प्राणियोंका शरीर उच्छ्वासहीन दिखायी देता है। उसमें गर्मी, उच्छ्वास, शोभा और चेतना कुछ भी नहीं रह जाती। इस तरह जीवात्मासे परित्यक्त उस शरीरको लोग मृत (मरा हुआ) कहते हैं॥ २३ १/२ ॥
स्रोतोभिर्यैर्विजानाति इन्द्रियार्थाञ्शरीरभृत्॥ २४॥
तैरेव न विजानाति प्राणानाहारसम्भवान्।
तत्रैव कुरुते काये यः स जीवः सनातनः॥ २५ ॥
देहधारी जीव जिन इन्द्रियोंके द्वारा रूप, रस आदि विषयोंका अनुभव करता है, उनके द्वारा वह भोजनसे परिपुष्ट होनेवाले प्राणोंको नहीं जान पाता। इस शरीरके भीतर रहकर जो कार्य करता है, वह सनातन जीव है॥ २४-२५॥