गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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जो जीवका जीवन बताया जाता है, उसे अच्छी तरह समझ लो ॥ १४ ॥
ऊष्मा प्रकुपितः काये तीव्रवायुसमीरितः।
शरीरमनुपर्येत्य सर्वान् प्राणान् रुणद्धि वै॥ १५॥
शरीरमें तीव्र वायुसे प्रेरित हो पित्तका प्रकोप बढ़ जाता है और वह शरीरमें फैलकर समस्त प्राणोंकी गतिको रोक देता है॥ १५॥
अत्यर्थं बलवानूष्मा शरीरे परिकोपितः।
भिन्नत्ति जीवस्थानानि मर्माणि विद्धि तत्त्वतः॥ १६॥
इस शरीरमें कुपित होकर अत्यन्त प्रबल हुआ पित्त जीवके मर्मस्थानोंको विदीर्ण कर देता है। इस बातको ठीक समझो॥ १६॥
ततः सवेदनः सद्यो जीवः प्रच्यवते क्षरात्।
शरीरं त्यजते जन्तुश्छिद्यमानेषु मर्मसु॥ १७॥
जब मर्मस्थान छिन्न-भिन्न होने लगते हैं, तब वेदनासे व्यथित हुआ जीव तत्काल इस जड शरीरसे निकल जाता है। उस शरीरको सदाके लिये त्याग देता है॥ १७॥
वेदनाभिः परीतात्मा तद् विद्धि द्विजसत्तम।
जातीमरणसंविग्नाः सततं सर्वजन्तवः॥ १८॥
द्विजश्रेष्ठ! मृत्युकालमें जीवका तन-मन वेदनासे व्यथित होता है, इस बातको भलीभाँति जान लो। इस तरह संसारके सभी प्राणी सदा जन्म और मरणसे उद्विग्न रहते हैं॥ १८॥
दृश्यन्ते सन्त्यजन्तश्च शरीराणि द्विजर्षभ।
गर्भसङ्क्रमणे चापि मर्मणामतिसर्पणे॥ १९॥
तादृशीमेव लभते वेदनां मानवः पुनः।
भिन्नसन्धिरथ क्लेदमद्भिः स लभते नरः॥ २०॥
विप्रवर! सभी जीव अपने शरीरका त्याग करते देखे जाते हैं। गर्भमें मनुष्य प्रवेश करते समय तथा गर्भसे नीचे गिरते समय भी वैसी