गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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तथा यद्यद् भवेद् युक्तं सन्निपाते क्वचित् क्वचित् ।
तत्तन्मर्म विजानीहि शास्त्रदृष्टं हि तत् तथा ॥ २६ ॥
कहीं-कहीं सन्धिस्थानोंमें जो-जो अंग संयुक्त होता है, उस-उसको तुम मर्म समझो; क्योंकि शास्त्रमें मर्मस्थानका ऐसा ही लक्षण देखा गया है ॥ २६ ॥
तेषु मर्मसु भिन्नेषु ततः स समुदीरयन् ।
आविश्य हृदयं जन्तोः सत्त्वं चाशु रुणद्धि वै ॥ २७ ॥
उन मर्मस्थानों (सन्धियों)-के विलग होनेपर वायु ऊपरको उठती हुई प्राणीके हृदयमें प्रविष्ट हो शीघ्र ही उसकी बुद्धिको अवरुद्ध कर लेती है ॥ २७ ॥
ततः सचेतनो जन्तुर्नाभिजानाति किञ्चन ।
तमसा संवृतज्ञानः संवृतेष्वेव मर्मसु ।
स जीवो निरधिष्ठानश्चाल्यते मातरिश्वना ॥ २८ ॥
तब अन्तकाल उपस्थित होनेपर प्राणी सचेतन होनेपर भी कुछ समझ नहीं पाता; क्योंकि तम (अविद्या)-के द्वारा उसकी ज्ञानशक्ति आवृत हो जाती है। मर्मस्थान भी अवरुद्ध हो जाते हैं। उस समय जीवके लिये कोई आधार नहीं रह जाता और वायु उसे अपने स्थानसे विचलित कर देती है ॥ २८ ॥
ततः सतं महोच्छ्वासं भृशमुच्छ्वस्य दारुणम् ।
निष्क्रामन् कम्पयत्याशु तच्छरीरमचेतनम् ॥ २९ ॥
तब वह जीवात्मा बारम्बार भयंकर एवं लम्बी साँस छोड़कर बाहर निकलने लगता है। उस समय सहसा इस जड शरीरको कम्पित कर देता है ॥ २९ ॥
स जीवः प्रच्युतः कायात् कर्मभिः स्वैः समावृतः ।
अभितः स्वैः शुभैः पुण्यैः पापैर्वाप्युपपद्यते ॥ ३० ॥
शरीरसे अलग होनेपर वह जीव अपने किये हुए शुभ कार्य पुण्य