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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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३४२ * गीता-संग्रह *


सम्भाषमाणमेकान्ते समासीनं च तैः सह।
यदृच्छया च गच्छन्तमसक्तं पवनं यथा॥ २४॥

वे मुक्तकी भाँति विचरनेवाले, सिद्ध, शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान, सर्वत्र घूमनेवाले और अन्तर्धान विद्याके ज्ञाता थे। अदृश्य रहनेवाले चक्रधारी सिद्धोंके साथ वे विचरते, बातचीत करते और उन्हींके साथ एकान्तमें बैठते थे। जैसे वायु कहीं आसक्त न होकर सर्वत्र प्रवाहित होती है, उसी तरह वे सर्वत्र अनासक्त भावसे स्वच्छन्दतापूर्वक विचरा करते थे। महर्षि काश्यप उनकी उपर्युक्त महिमा सुनकर ही उनके पास गये थे॥ २२—२४॥

तं समासाद्य मेधावी स तदा द्विजसत्तमः।
चरणौ धर्मकामोऽस्य तपस्वी सुसमाहितः।
प्रतिपेदे यथान्यायं दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम्॥ २५॥
विस्मितश्चाद्भुतं दृष्ट्वा काश्यपस्तद् द्विजोत्तमम्।
परिचारेण महता गुरुं तं पर्यतोषयत्॥ २६॥
उपपन्नं च तत्सर्वे श्रुतचारित्रसंयुतम्।
भावेनातोषयच्चैनं गुरुवृत्त्या परन्तपः॥ २७॥

निकट जाकर उन मेधावी, तपस्वी, धर्माभिलाषी और एकाग्रचित्त महर्षिने न्यायानुसार उन सिद्ध महात्माके चरणोंमें प्रणाम किया। वे ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ और बड़े अद्भुत सन्त थे। उनमें सब प्रकारकी योग्यता थी। वे शास्त्रके ज्ञाता और सच्चरित्र थे। उनका दर्शन करके काश्यपको बड़ा विस्मय हुआ। वे उन्हें गुरु मानकर उनकी सेवामें लग गये और अपनी शुश्रूषा, गुरुभक्ति तथा श्रद्धाभावके द्वारा उन्होंने उन सिद्ध महात्माको सन्तुष्ट कर लिया॥ २५—२७॥

तस्मै तुष्टः स शिष्याय प्रसन्नो वाक्यमब्रवीत्।
सिद्धिं परामभिप्रेक्ष्य शृणु मत्तो जनार्दन॥ २८॥

जनार्दन! अपने शिष्य काश्यपके ऊपर प्रसन्न होकर उन सिद्ध