गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- उत्तरगीता *
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महर्षिने परासिद्धिके सम्बन्धमें विचार करके जो उपदेश किया, उसे बताता हूँ, सुनो॥ २८॥
सिद्ध उवाच
विविधैः कर्मभिस्तात पुण्ययोगैश्च केवलैः।
गच्छन्तीह गतिं मर्त्या देवलोके च संस्थितिम्॥ २९॥
**सिद्धने कहा—**तात काश्यप! मनुष्य नाना प्रकारके शुभ कर्मोंका अनुष्ठान करके केवल पुण्यके संयोगसे इस लोकमें उत्तम फल और देवलोकमें स्थान प्राप्त करते हैं॥ २९॥
न क्वचित् सुखमत्यन्तं न क्वचिच्छाश्वती स्थितिः।
स्थानाच्च महतो भ्रंशो दुःखलब्धात् पुनः पुनः॥ ३०॥
जीवको कहीं भी अत्यन्त सुख नहीं मिलता। किसी भी लोकमें वह सदा नहीं रहने पाता। तपस्या आदिके द्वारा कितने ही कष्ट सहकर बड़े-से-बड़े स्थानको क्यों न प्राप्त किया जाय, वहाँसे भी बार-बार नीचे आना ही पड़ता है॥ ३०॥
अशुभा गतयः प्राप्ताः कष्टा मे पापसेवनात्।
काममन्युपरीतेन तृष्णया मोहितेन च॥ ३१॥
मैंने काम-क्रोधसे युक्त और तृष्णासे मोहित होकर अनेकों बार पाप किये हैं और उनके सेवनके फलस्वरूप घोर कष्ट देनेवाली अशुभ गतियोंको भोगा है॥ ३१॥
पुनः पुनश्च मरणं जन्म चैव पुनः पुनः।
आहारा विविधा भुक्ताः पीता नानाविधाः स्तनाः॥ ३२॥
बार-बार जन्म और बार-बार मृत्युका क्लेश उठाया है। तरह-तरहके आहार ग्रहण किये और अनेक स्तनोंका दूध पीया है॥ ३२॥