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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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Page 342
  • उत्तरगीता * ३४१

ब्राह्मण उवाच

मोक्षधर्मं समाश्रित्य कृष्ण यन्मामपृच्छथाः।
भूतानामनुकम्पार्थं यन्मोहच्छेदनं विभो॥ १७॥
तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यथावन्मधुसूदन।
शृणुष्वावहितो भूत्वा गदतो मम माधव॥ १८॥

ब्राह्मणने कहा—श्रीकृष्ण! मधुसूदन! तुमने सब प्राणियोंपर कृपा करके उनके मोहका नाश करनेके लिये जो यह मोक्ष-धर्मसे सम्बन्ध रखनेवाला प्रश्न किया है, उसका मैं यथावत् उत्तर दे रहा हूँ। प्रभो! माधव! सावधान होकर मेरी बात श्रवण करो॥ १७-१८॥

कश्चिद् विप्रस्तपोयुक्तः काश्यपो धर्मवित्तमः।
आससाद द्विजं कञ्चिद् धर्माणामागतागमम्॥ १९॥
गतागते सुबहुशो ज्ञानविज्ञानपारगम्।
लोकतत्त्वार्थकुशलं ज्ञातार्थं सुखदुःखयोः॥ २०॥
जातीमरणतत्त्वज्ञं कोविदं पापपुण्ययोः।
द्रष्टारमुच्चनीचानां कर्मभिर्देहिनां गतिम्॥ २१॥

प्राचीन समयमें काश्यप नामके एक धर्मज्ञ और तपस्वी ब्राह्मण किसी सिद्ध महर्षिके पास गये; जो धर्मके विषयमें शास्त्रके सम्पूर्ण रहस्योंको जाननेवाले, भूत और भविष्यके ज्ञान-विज्ञानमें प्रवीण, लोक-तत्त्वके ज्ञानमें कुशल, सुख-दुःखके रहस्यको समझनेवाले, जन्म-मृत्युके तत्त्वज्ञ, पाप-पुण्यके ज्ञाता और ऊँच-नीच प्राणियोंको कर्मानुसार प्राप्त होनेवाली गतिके प्रत्यक्ष द्रष्टा थे॥ १९—२१॥

चरन्तं मुक्तवत्सिद्धं प्रशान्तं संयतेन्द्रियम्।
दीप्यमानं श्रिया ब्राह्मया क्रममाणं च सर्वशः॥ २२॥
अन्तर्धानगतिज्ञं च श्रुत्वा तत्त्वेन काश्यपः।
तथैवान्तर्हितैः सिद्धैर्यान्तं चक्रधरैः सह॥ २३॥