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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

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Page 277

२७६ * गीता-संग्रह *


अनुभवमें स्थिति होनेको ‘समाधि’ कहते हैं॥ ३३-३४॥
घटध्वंसाद्यथाकाशमभिन्नं नभसा भवेत्।
मुक्तो जीवो ब्रह्मणैवं सद्ब्रह्म ब्रह्म वै भवेत्॥ ३५॥
आत्मानं मन्यते ब्रह्म जीवो ज्ञानेन नान्यथा।
जीवो ह्यज्ञानतत्कार्यमुक्तः स्यादजरामरः॥ ३६॥
जैसे घड़ा फूट जानेपर घटाकाश महाकाशसे अभिन्न (एक) हो जाता है, उसी प्रकार मुक्त जीव ब्रह्मके साथ एकीभावको प्राप्त होता है—वह सत्स्वरूप ब्रह्म ही हो जाता है। ज्ञानसे ही जीव अपनेको ब्रह्म मानता है, अन्यथा नहीं। अज्ञान और उसके कार्योंसे मुक्त होनेपर जीव अजर-अमर हो जाता है॥ ३५-३६॥

अग्निरुवाच
वसिष्ठ यमगीतोक्ता पठतां भुक्तिमुक्तिदा।
आत्यन्तिको लयः प्रोक्तो वेदान्तब्रह्मधीमयः॥ ३७॥
अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! यह मैंने यमगीता बतलायी है। इसे पढ़नेवालोंको यह भोग और मोक्ष प्रदान करती है। वेदान्तके अनुसार सर्वत्र ब्रह्मबुद्धिका होना ‘आत्यन्तिक लय’ कहलाता है॥ ३७॥

॥ इति श्रीअग्निमहापुराणे यमगीता सम्पूर्णा॥