गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
Page 276 of 675
Read in context- यमगीता (२) * २७५
ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेच्छान्त आत्मनि।
सम्पूर्ण भूतोंमें छिपा हुआ यह आत्मा प्रकाशमें नहीं आता। सूक्ष्मदर्शी पुरुष अपनी तीव्र एवं सूक्ष्म बुद्धिसे ही उसे देख पाते हैं। विद्वान् पुरुष वाणीको मनमें और मनको विज्ञानमयी बुद्धिमें लीन करे। इसी प्रकार बुद्धिको महत्तत्त्वमें और महत्तत्त्वको शान्त आत्मामें लीन करे ॥ २८-२९ १/२ ॥
ज्ञात्वा ब्रह्मात्मनोर्योगं यमाद्यैर्ब्रह्म सद्भवेत् ॥ ३० ॥
अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यापरिग्रही।
यमाश्च नियमाः पञ्च शौचं सन्तोषसत्तपः ॥ ३१ ॥
स्वाध्यायेश्वरपूजा च आसनं पद्मकादिकम्।
प्राणायामो वायुजयः प्रत्याहारः स्वनिग्रहः ॥ ३२ ॥
यम-नियमादि साधनोंसे ब्रह्म और आत्माकी एकताको जानकर मनुष्य सत्स्वरूप ब्रह्म ही हो जाता है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरीका अभाव), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (संग्रह न करना)—ये पाँच 'यम' कहलाते हैं। 'नियम' भी पाँच ही हैं—शौच (बाहर-भीतरकी पवित्रता), सन्तोष, उत्तम तप, स्वाध्याय और ईश्वरपूजा। 'आसन' बैठनेकी प्रक्रियाका नाम है, उसके 'पद्मासन' आदि कई भेद हैं। प्राणवायुको जीतना 'प्राणायाम' है। इन्द्रियोंका निग्रह 'प्रत्याहार' कहलाता है ॥ ३०—३२ ॥
शुभे ह्येकत्र विषये चेतसो यत् प्रधारणम्।
निश्चलत्वात्तु धीमद्भिर्धारणा द्विज कथ्यते ॥ ३३ ॥
पौनःपुन्येन तत्रैव विषयेष्वेव धारणा।
ध्यानं स्मृतं समाधिस्तु अहं ब्रह्मात्मसंस्थितिः ॥ ३४ ॥
ब्रह्मन्! एक शुभ विषयमें जो चित्तको स्थिरतापूर्वक स्थापित करना होता है, उसे बुद्धिमान् पुरुष 'धारणा' कहते हैं। एक ही विषयमें बारम्बार धारणा करनेका नाम 'ध्यान' है। 'मैं ब्रह्म हूँ'—इस प्रकारके