गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in contextहंसगीता-( १ )
[हंसगीता नामसे प्रख्यात गीता श्रीमद्भागवतमहापुराणके एकादश स्कन्धमें भगवान् श्रीकृष्णद्वारा श्रीउद्धवजीको भक्ति-मुक्तिका उपदेश देते समय वर्णित हुई है। इसमें भगवान्के हंसावतारद्वारा ब्रह्माजीके मानस पुत्रों—सनकादिक ऋषियोंकी योगकी पराकाष्ठा अर्थात् परमार्थतत्त्व-सम्बन्धी जिज्ञासाका समाधान किया गया है। चित्तको विषयोंसे कैसे पृथक् करे, इसका गूढ़ तात्त्विक उपाय इसमें बताया गया है। जिज्ञासुओंको इस गीतामें सांख्य, योग तथा वेदान्तकी त्रिवेणी दृष्टिगोचर होगी। इसी लघु कलेवरवाली हंसगीताको यहाँ सानुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है— ]
श्रीभगवानुवाच
सत्त्वं रजस्तम इति गुणा बुद्धेर्न चात्मनः।
सत्त्वेनान्यतमौ हन्यात् सत्त्वं सत्त्वेन चैव हि॥ १ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिय उद्धव! सत्त्व, रज और तम—ये तीनों बुद्धि (प्रकृति)-के गुण हैं, आत्माके नहीं। सत्त्वके द्वारा रज और तम—इन दो गुणोंपर विजय प्राप्त कर लेनी चाहिये। तदनन्तर सत्त्वगुणकी शान्तवृत्तिके द्वारा उसकी दया आदि वृत्तियोंको भी शान्त कर देना चाहिये॥ १ ॥
सत्त्वाद् धर्मो भवेद् वृद्धात् पुंसो मद्भक्तिलक्षणः।
सात्त्विकोपासया सत्त्वं ततो धर्मः प्रवर्तते॥ २ ॥
जब सत्त्वगुणकी वृद्धि होती है, तभी जीवको मेरे भक्तिरूप स्वधर्मकी प्राप्ति होती है। निरन्तर सात्त्विक वस्तुओंका सेवन करनेसे ही सत्त्वगुणकी वृद्धि होती है और तब मेरे भक्तिरूप स्वधर्ममें प्रवृत्ति होने लगती है॥ २ ॥