गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context* गणेशगीता * २१
दूसरा अध्याय
कर्मयोग
वरेण्य उवाच
ज्ञाननिष्ठा कर्मनिष्ठा द्वयं प्रोक्तं त्वया विभो।
अवधार्य वदैकं मे निःश्रेयसकरं नु किम्॥ १॥
वरेण्यने कहा—हे भगवन्! आपने ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठा दोनोंका वर्णन किया, आप दोनोंमेंसे एक निश्चयकर जो कल्याणदायक हो, उसे कहिये॥ १॥
गजानन उवाच
अस्मिंश्चराचरे स्थित्यौ पुरोक्ते द्वे मया प्रिय।
सांख्यानां बुद्धियोगेन वैधयोगेन कर्मणाम्॥ २॥
श्रीगजानन बोले—हे प्रिय! इस चराचर जगत्में मेरे द्वारा पहले वर्णित दो प्रकारकी स्थिति है, सांख्यशास्त्र जाननेवालोंकी ज्ञानयोगसे और कर्मके अधिकारीजनोंकी कर्मयोगसे शुद्धि होती है॥ २॥
अनारम्भेण वैधानां निष्क्रियः पुरुषो भवेत्।
न सिद्धिं याति सन्न्यागात्केवलात्कर्मणो नृप॥ ३॥
कर्ममें आसक्तजन कर्मोंके आरम्भ न करनेसे निष्क्रिय हो जाते हैं। हे राजन्! केवल कर्मोंके ही त्याग देनेसे सिद्धि नहीं होती॥ ३॥
कदाचिदक्रियः कोऽपि क्षणं नैवावतिष्ठते।
अस्वतन्त्रः प्रकृतिजैर्गुणैः कर्म च कार्यते॥ ४॥
किसी दशामें क्षणमात्र भी कर्म बिना किये कोई नहीं रह सकता है। प्रकृतिके स्वाभाविक तीनों गुण सबको ही अवश्य करके कर्म कराते हैं॥ ४॥
कर्मकारीन्द्रियग्रामं नियम्यास्ते स्मरन् पुमान्।
तद्गोचरान् मन्दचित्तो धिगाचारः स भाष्यते॥ ५॥
जो कर्म करनेवाला, इन्द्रियोंको रोककर मन-ही-मनमें इन्द्रियोंके