गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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* गीता-संग्रह *
विषयोंका स्मरण करता है, उस इन्द्रियलोलुप दुरात्माको तुच्छ आचारवाला कहा जाता है॥५॥
तद् ग्रामं सन्नियम्यादौ मनसा कर्म चारभेत्।
इन्द्रियैः कर्मयोगं यो वितृष्णः स परो नृप॥६॥
हे राजन्! जो मनसे इन्द्रियोंका संयम करके कर्मेन्द्रियोंसे निष्काम कर्मयोगका अनुष्ठान करता है, वही श्रेष्ठ पुरुष है॥६॥
अकर्मणः श्रेष्ठतमं कर्मानीहाकृतं तु यत्।
वर्ष्मणः स्थितिरप्यस्याकर्मणो नैव सेत्स्यति॥७॥
कर्म न करनेसे तो फलकी कामना करके भी कर्म करना श्रेष्ठ है, कारण कि सब कर्मोंका त्याग करनेसे तो शरीरयात्रा भी नहीं हो सकती॥७॥
असमर्प्य निबध्यन्ते कर्म तेन जना मयि।
कुर्वीत सततं कर्मनाशोऽसङ्गो मदर्पणम्॥८॥
जो प्राणी कर्मोंका फल मुझमें समर्पण नहीं करते, वे बन्धनमें पड़ते हैं, इस कारणसे निष्काम कर्मका अनुष्ठान करते हुए निरन्तर मुझे अर्पण करके कर्मबन्धनका नाश करना चाहिये॥८॥
मदर्थे यानि कर्माणि तानि बध्नन्ति न क्वचित्।
सवासनमिदं कर्म बध्नाति देहिनं बलात्॥९॥
जो कर्म मेरे निमित्त किये जाते हैं, वे कहीं और कभी बन्धनके कारण नहीं होते, किंतु जो वासनापूर्वक (फलासक्तिपूर्वक) किये गये कर्म हैं, वे ही बलात् प्राणीको बाँधते हैं॥९॥
वर्णान् सृष्ट्वावदं चाहं सयज्ञांस्तान् पुरा प्रिय।
यज्ञेन ऋध्यतामेष कामदः कल्पवृक्षवत्॥१०॥
पूर्वकालमें मैंने यज्ञरूप नित्यकर्मके ही साथ-साथ मनुष्योंके वर्णोंको रचकर कहा—हे मनुष्यो! तुम यज्ञसे वृद्धिको प्राप्त हो, यह