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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

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२० * गीता-संग्रह *


या रात्रिः सर्वभूतानां तस्यां निद्राति नैव सः।
न स्वपन्तीह ते यत्र ता रात्रिस्तस्य भूमिप॥ ६५॥
हे राजन्! अज्ञानसे आच्छादित सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये जो आत्मज्ञान रात्रिस्वरूप है, उसमें इन्द्रियको वशमें करनेवाले संयमी योगी जागते हैं और जिस विषयबुद्धिमें सम्पूर्ण प्राणी जागते हैं, वह विषयभोग ज्ञानियोंके लिये रात्रिस्वरूप है॥ ६५॥
सरितां पतिमायान्ति वनानि सर्वतो यथा।
अयान्ति यं तथा कामा न स शान्तिं क्वचिल्लभेतू॥ ६६॥
जिस प्रकारसे [नदियों आदिके] सभी जल समुद्रमें प्रवेश कर जाते हैं और उसकी तृप्ति नहीं होती, इसी प्रकार सब कामना पूर्ण होनेवालेको भी शान्ति नहीं होती॥ ६६॥
अतस्तानीह संरुध्य सर्वतः खानि मानवः।
स्वस्वार्थेभ्यः प्रधावन्ति बुद्धिरस्य स्थिरा तदा॥ ६७॥
इस कारण प्राणीको उचित है कि सब प्रकारसे विषयोंकी ओर दौड़ती हुई इन्द्रियोंको वशमें करे, तब उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है॥ ६७॥
ममताहंकृती त्यक्त्वा सर्वान् कामांश्च यस्त्यजेत्।
नित्यं ज्ञानरतो भूत्वा ज्ञानान्मुक्तिं स यास्यति॥ ६८॥
जो ममत्व, अहंकार और सब कामनाओंका त्याग करता है, नित्य ज्ञानमें मग्न रहता है, वह ज्ञानसे मुक्तिको प्राप्त हो जाता है॥ ६८॥
एवं ब्रह्मधियं भूप यो विजानाति दैवतः।
तुर्यामवस्थां प्राप्यापि जीवन्मुक्तिं प्रयास्यति॥ ६९॥
हे राजन्! जो वृद्धावस्थाको प्राप्त होकर भी दैवगतिसे इस ब्रह्मज्ञानयुक्त बुद्धिको प्राप्त हो जाता है, वह जीवन्मुक्त हो जाता है॥ ६९॥

॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां सांख्यसारार्थयोगो नाम
प्रथमोऽध्यायः॥ १॥