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Read in contextप्रेतकल्प ] आशौचकी व्यवस्था ५७७
राजा और श्रोत्रिय ब्राह्मणोंकी सद्यः शुद्धि बतायी गयी है। याज्ञिक (व्रतपरायण), मन्त्रपूत, अग्निहोत्री तथा राजा सदैव शुद्ध होते हैं। इन्हें अशौच नहीं होता है। राजागण जिसकी इच्छा करते हैं, वह भी पवित्र ही रहता है।
हे द्विज ! बच्चेका जन्म होनेपर सपिण्डों और सगोत्रियोंको एक-जैसा अशौच नहीं होता। दस दिनके बाद माता शुद्ध हो जाती है और पिता तत्काल स्नान करके ही स्पर्शादिके लिये पवित्र हो जाता है। मनुने कहा है कि विवाहोत्सव तथा यज्ञके आयोजनमें यदि जन्म या मृत्युका सूतक हो जाता है तो पूर्व मानस संकल्पित धन और पूर्वनिर्मित खाद्यसामग्रीका उपयोग करनेमें दोष नहीं है। सभी वर्णोंके लिये अशौच समानरूपसे माननीय है। माता-पिताको जो सूतक होता है, उसमें माताके लिये तो सूतक होता है और पिता स्नान करके तुरंत शुद्ध हो जाता है। दस दिनके लिये प्रवृत्त जननाशौच और मरणाशौचके अन्तर्गत यदि पुनः जन्म-मरण हो जाता है, तो पूर्वप्रवृत्त अशौचको तीन भागोंमें विभक्त करके यदि पुनर्जन्म-मरण दो भागके अन्तर्गत हुआ है तो पूर्व अशौचकी निवृत्तिके दिनसे उत्तराशौचकी भी निवृत्ति हो जायगी। किंतु यदि पूर्वप्रवृत्त अशौचके तीसरे भागमें पुनराशौच प्रवृत्त हुआ है तो उत्तराशौचमें प्रवृत्तिके समाप्तिपर ही यदि सूतक दशाहके बीच पुनः किसी सगोत्रीका मरण या जन्म होता है तो इस अशौचकी जबतक शुद्धि नहीं होती तबतक अशौच रहता है।*
ऋषियोंने कहा है कि मनमें दान देनेकी भावना उत्पन्न हो जानेपर समय जैसा भी हो दीन-दुःखी ब्राह्मणको विनम्रतापूर्वक दान देना चाहिये, उसमें दोष नहीं होता है।
अशौच होनेपर मनुष्य पहले मिट्टीके पात्रसे तिलमिश्रित जलका स्नानकर शरीरपर मिट्टीका लेप करे, तत्पश्चात् स्वच्छ जलसे पुनः स्नान करके शुद्ध हो।
अशौचके बाद दान सभासदको देना चाहिये। सुवर्ण, गौ और वृषका दान ब्राह्मणको देना चाहिये। ब्राह्मणकी अपेक्षा क्षत्रिय दुगुना, वैश्य तिगुना तथा शूद्र चौगुना धन ब्राह्मणको दान दे। गृह्यसूत्रोक्त संस्कारसे रहित होनेपर सातवें अथवा आठवें वर्षमें मृत्यु हो जाय तो जितने वर्षका वह मृतक व्यक्ति था उतने दिनका अशौच मानना चाहिये। ब्राह्मण और स्त्रीकी रक्षाके लिये जो अपने प्राणोंका परित्याग करते हैं तथा जो लोग गोशाला तथा रणभूमिमें प्राणोंका परित्याग करते हैं, उनका अशौच एक रात्रिका होता है। जो नरश्रेष्ठ अनाथ प्रेतका संस्कार करते हैं, उन ब्राह्मणोंका किसी शुभ कर्ममें कुछ भी अशुभ नहीं होता है। ब्राह्मणके सहयोगसे अन्य वर्णवाले जो इस कर्मको सम्पन्न करते हैं, उनका भी कुछ अशुभ नहीं होता है। स्नान करनेसे उनकी सद्यः शुद्धि हो जाती है।
अशौचसे विधिवत् शुद्ध होकर जब शूद्र जलके मध्य स्नान कर रहे हों तभी ब्राह्मणको उन्हें देखना चाहिये। (अध्याय ३९)
* आद्यं भागद्वयं यावत् सूतकस्य तु सूतके। द्वितीये पतिते त्वाद्यात् सूतकाच्छुद्धिरिष्यते ॥ (ब्रह्मपुराण)