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Read in context| ५७६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड— |
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स्त्री अनेक प्रकारके पापोंको करके भी जब मरे हुए उस पतिका अनुगमन चितापर चढ़कर करती है तो उन सभी पापोंको धो डालती है। यदि किसी सच्चरित्र नारीका पति महापापोंका आचरण करता हुआ दुष्कर्मी बन जाता है तो वह स्त्री अपने सदाचरणसे उसके सभी पापोंको विनष्ट कर देती है।
जो व्यक्ति नियमपूर्वक प्रतिदिन मात्र एक ग्रास भोजनका दान करता है, वह चार चामरसे युक्त दिव्य विमानपर चढ़कर स्वर्गलोक जाता है। जिस मनुष्यके द्वारा आजीवन पाप-कर्म किया गया है, वह ब्राह्मणको एक वर्षके लिये जीवन-निर्वाहकी वृत्ति देकर उस पापको विनष्ट कर देता है। विप्र-कन्याका विवाह करानेवाला व्यक्ति भूत, भविष्य और वर्तमानके तीनों जन्मके अर्जित पापोंको नष्ट कर देता है।
दस कूपके समान एक बावली होती है। दस बावलीके समान सरोवर होता है और दस सरोवरके समान पुण्य-शालिनी वह प्रपा (पौंसरा) होती है। जो वापी जलरहित वन एवं देशमें बनवायी जाती है और जो दान निर्धन ब्राह्मणको दिया जाता है तथा प्राणियोंपर जो दया की जाती है, उसके पुण्यसे कर्ता स्वर्गलोकका नायक बन जाता है।*
इसी प्रकार अन्य बहुत-से सुकृत हैं, जिनको करके मनुष्य स्वर्गलोकका भागी होता है। वह उन सभी पुण्योंके फलको ग्रहण करके परम प्रतिष्ठाको प्राप्त करता है।
व्यर्थके कार्योंको छोड़कर निरन्तर धर्माचरण करना चाहिये। इस पृथ्वीपर दान, दम और दया—ये ही तीन सार हैं। दरिद्र, सज्जन ब्राह्मणको दान, निर्जन प्रदेशमें स्थित शिवलिङ्गका पूजन और अनाथ प्रेतका संस्कार—करोड़ों यज्ञका फल प्रदान करता है—
फल्गु कार्यं परित्यज्य सततं धर्मवान् भवेत्।
<div align="right">(३८। ३९-४०)<br>(अध्याय ३८)</div>
दानं दमो दया चेति सारमेतत् त्रयं भुवि॥
दानं साधोर्दरिद्रस्य शून्यलिंगस्य पूजनम्।
अनाथप्रेतसंस्कारः कोटियज्ञफलप्रदः॥
आशौचकी व्यवस्था
तार्क्ष्यने कहा— हे प्रभो! चित्तमें शुचित्व और अशुचित्वके विवेकके लिये और जनहितार्थ आप मुझपर दया करके सूतक-विधिका वर्णन करें।
श्रीकृष्णने कहा— हे पक्षीन्द्र! मृत्यु तथा जन्म होनेपर चार प्रकारका सूतक होता है, सामान्यतः जो चारों वर्णोंके द्वारा यथाविधि दूर करनेके योग्य है। जननाशौच और मरणाशौच होनेपर दस दिनोंतक उस कुलका अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिये। इस कालमें दान, प्रतिग्रह, होम और स्वाध्याय बंद हो जाता है। देश, काल, आत्मशक्ति, द्रव्य, द्रव्यप्रयोजन, औचित्य तथा वयको जान करके ही अशौच-कर्मके विहित नियमोंका पालन करना चाहिये।
गुफा और अग्निमें प्रवेश तथा देशान्तरमें जाकर मरे हुए परिजनोंका अशौच तत्काल वस्त्रसहित स्नान करनेसे समाप्त हो जाता है। जो प्राणी गर्भस्राव या गर्भसे निकलते ही मर जाते हैं, उनका अग्निदाह, अशौच एवं तिलोदक संस्कार नहीं होता है। शिल्पी, विश्वकर्मा, वैद्य, दासी, दास,
* दशकूपसमा वापी दशवापीसमं सरः। सरोभिर्दशभिस्तुल्या या प्रपा निर्जले वने॥
या वापी निर्जले देशे यद्दानं निर्धने द्विजे। प्राणिनां यो दयां धत्ते स भवेन्नाकनायकः॥ (३८। ३६-३७)