Skip to content
SarvaKosh
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished634 pages

Page 588 of 634

Read in context
Page 588
५७८संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

दुर्मृत्यु होनेपर सद्गतिलाभके लिये नारायणबलिका विधान

तार्क्ष्यने कहा— भगवन्! किन्हीं ब्राह्मणोंकी अपमृत्यु होती है, उनका पारलौकिक मार्ग कैसा है? उन्हें वहाँ कैसा स्थान प्राप्त होता है? उनकी कौन-सी गति होती है? उनके लिये क्या उचित है और क्या विधान है? हे मधुसूदन! मैं उन सभी बातोंको सुनना चाहता हूँ। कृपया आप उनका वर्णन करें।

श्रीकृष्णने कहा— हे गरुड! जो ब्राह्मण विकृत मृत्युके कारण प्रेत हो गये हैं, उनके मार्ग, पारलौकिक गति, स्थान और प्रेतकर्म-विधानको मैं कह रहा हूँ। यह परम गोपनीय है, इसे तुम सुनो। जो ब्राह्मण खाई, नदी, नाला लाँघते हुए और सर्प आदिके काटनेसे मर जाते हैं, जिनकी मृत्यु गला दबाने तथा जलमें डुबानेसे होती है, जो दुर्बल ब्राह्मण हाथीकी सूँड़के प्रहारसे, विषपानसे, क्षीण होकर, अग्निदाह, साँड़-प्रहार तथा विषूचिका (हैजा) रोगसे मरते हैं, जिनके द्वारा आत्महत्या कर ली जाती है, जो गिरकर, फाँसी लगाकर और जलमें डूबकर मर जाते हैं, उनकी स्थितिको तुम सुनो।

जो ब्राह्मण म्लेच्छादि जातियोंद्वारा मारे जाते हैं, वे घोर नरक प्राप्त करते हैं। जो कुत्ता, सियारादिके स्पर्श, दाह-संस्काररहित, कीटाणुओंसे परिव्याप्त, वर्णाश्रम-धर्मसे दूर और महारोगोंसे पीड़ित होकर मरते हैं, दोषसिद्ध, व्यङ्ग्यपूर्ण बात, पापियोंके द्वारा प्रदत्त अन्नका सेवन करते हैं, चाण्डाल, जल, सर्प, ब्राह्मण, विद्युत्-निपात, अग्नि, दन्तधारी पशु तथा वृक्षादि पतनके कारण जिनकी अपमृत्यु होती है, जो रजस्वला, प्रसवा, शूद्रा और धोबिनके सहवाससे दोषयुक्त हो गये हैं, वे सभी उस पापसे नरक-भोग करके प्रेतयोनि प्राप्त करते हैं। परिजनोंको उनका दाह-संस्कार, अशौच-निवृत्ति एवं जलक्रियाका कर्म नहीं करना चाहिये। हे तार्क्ष्य! ऐसे पापियोंका नारायणबलिके बिना मृत्युका आद्य कर्म, और्ध्वदैहिक कर्म भी नहीं करना चाहिये।

हे पक्षिराज! सभी प्राणियोंका कल्याण करनेके लिये पाप और भयको दूर करनेवाली उस नारायणबलिके विधानको सुनो। छः मासकी अवधिमें ब्राह्मण, तीन मासमें क्षत्रिय, डेढ़ मासमें वैश्य तथा शूद्रकी तत्काल दाह (पुत्तलिका-दाह)-क्रिया करनी चाहिये। गङ्गा, यमुना, नैमिष, पुष्कर, जलपूर्ण तालाब, स्वच्छ जलयुक्त गम्भीर जलाशय, बावली, कूप, गोशाला, घर या मन्दिरमें भगवान् विष्णुके सामने ब्राह्मण इस नारायणबलिको सम्पन्न करायें। पौराणिक और वैदिक मन्त्रोंसे प्रेतका तर्पण किया जाय। इसके बाद यजमान सभी औषधियोंसे युक्त जल तथा अक्षत लेकर विष्णुका भी तर्पण पुरुषसूक्त अथवा अन्य वैष्णवमन्त्रोंसे करके दक्षिणाभिमुख होकर प्रेतका विष्णुरूपमें इस मन्त्रसे ध्यान करे—

अनादिनिधनो देवः शङ्खचक्रगदाधरः ॥
अव्ययः पुण्डरीकाक्षः प्रेतमोक्षप्रदो भवेत् ।
(४०। १७-१८)

अनादि, अनन्त, शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले अव्ययदेव पुण्डरीकाक्ष भगवान् प्रेतको मोक्ष प्रदान करें।

तर्पण समाप्त हो जानेके पश्चात् रागमुक्त, ईर्ष्या-द्वेष-रहित, जितेन्द्रिय, पवित्र, धर्मपरायण, दानधर्ममें संलग्न, शान्तचित्त, एकाग्रचित्त होकर भगवान् विष्णुको प्रणाम करके तथा वाणीपर संयम रखते हुए अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ यजमान शुद्ध हो। उसके बाद भक्तिपूर्वक वहाँ एकादश श्राद्ध करे। समाहित होकर जल, धान, यव, साठी धान, गेहूँ, कंगनी (टाँगुन), शुभ हविष्यान्न, मुद्रा, छत्र, पगड़ी,