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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 547 of 634

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Page 547

प्रेतकल्प ] बालकोंकी अन्त्येष्टिक्रियाका स्वरूप ५३७


निर्धन होकर प्रेम तथा भक्तिसे दूर रहता है। उसे पुनर्जन्म प्राप्त होता है, अतः मृत शिशुके लिये यथेप्सित दान आवश्यक है। ऐसा होनेपर ब्राह्मण-बालकोंको मिष्टान्न-भोजन अवश्य देना चाहिये। पुराणमें इससे सम्बन्धित जिस गाथाका गान हुआ है सब प्रकारसे वह मुझे सत्य प्रतीत होती है। गाथा इस प्रकार है—

भोज्ये भोजनशक्तिश्च रतिशक्तिर्वरस्त्रियः॥
विभवे दानशक्तिश्च नाल्पस्य तपसः फलम्।
दानाद्भोगानवाप्नोति सौख्यं तीर्थस्य सेवनात्।
सुभाषान्मृतो यस्तु स विद्वान्धर्मवित्तमः॥
अदत्तदानाच्च भवेद्दरिद्रो
दरिद्रभावाच्च करोति पापम्।
पापप्रभावान्नरकं प्रयाति
पुनर्दरिद्रः पुनरेव पापी॥
(२४।४४–४६)

भोज्य वस्तु एवं भोजनशक्ति, रतिशक्ति रहनेपर श्रेष्ठ स्त्रीकी प्राप्ति तथा धन-वैभव एवं दानशक्ति—ये तीनों अल्प तपस्याका फल नहीं हैं, ऐसा साथ-साथ होना बड़ा ही दुर्लभ है। दान देनेसे प्राणीको भोगोंकी प्राप्ति होती है। तीर्थसेवनसे सुख मिलता है और सुभाषण करता हुआ जो मरता है, वह विद्वान् धर्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ है। दान न देनेपर प्राणी दरिद्र होता है, दरिद्र होनेपर पाप करता है, पापके प्रभावसे नरकमें जाता है, तदनन्तर बार-बार वह दरिद्र एवं पापी बनता जाता है। (अध्याय २४)


बालकोंकी अन्त्येष्टिक्रियाका स्वरूप, सत्पुत्रकी महिमा तथा औरस और क्षेत्रज आदि पुत्रोंद्वारा अन्त्येष्टि करनेका फल

श्रीविष्णुने कहा—हे गरुड! इसके बाद अब मैं पुरुष-स्त्रीका निर्णय कहूँगा। बालक जीवित हो अथवा मृत्युको प्राप्त हो गया हो, पाँच वर्षसे अधिक अवस्था हो जानेपर उसमें पुरुषत्व प्रतिष्ठित हो जाता है। वह अपनी समस्त इन्द्रियोंको जान लेता है और रूप तथा कुरूपके विपर्ययको जाननेकी क्षमता भी उसमें आ जाती है। पूर्वजन्मार्जित कर्मफलसे प्राणियोंका वध और बन्धन होता है। पाप ही सभी लोगोंको नष्ट करता है।

हे पक्षिराज! गर्भके नष्ट होनेपर कोई और्ध्वदैहिक क्रिया नहीं है। शिशुकी मृत्यु होनेपर दुग्धका दान देना चाहिये, शैशवके बादकी अवस्थामें बालककी मृत्यु होनेपर पायस तथा खीरका दान देना चाहिये। कुमारकी अवस्थामें मृत्यु होनेपर एकादशाह, द्वादशाह, वृषोत्सर्ग तथा महादानको छोड़कर अन्य सभी और्ध्वदैहिक कृत्य करनेका आदेश किया गया है। मरे हुए कुमार और बालकोंके निमित्त भोजन-वस्त्र तथा वेष्टन देना चाहिये। बाल, वृद्ध अथवा तरुणके मरनेपर घट-बन्धन करना चाहिये।

हे खगश्रेष्ठ! दो माह कम दो वर्षतकके बालककी मृत्यु होनेपर उसको पृथ्वीमें गड्ढा खोदकर गाड़ देना चाहिये, इससे अधिक आयुवाले मृत बालकके लिये दाह-संस्कारका ही विधान उत्तम है। सभी शास्त्रोंमें जन्मसे लेकर दाँत निकलनेतककी अवस्थावाले बच्चेको शिशु, चूड़ाकरण-संस्कारतककी अवस्थावालेको बालक और उपनयन-संस्कारतककी आयुवालेको कुमार कहा गया है।

हे गरुड! उपनयन-संस्कारका विधान न होनेके कारण शूद्रादिका अन्तिम संस्कार कैसे होना चाहिये? यह संशय है। गर्भाधानसे नौ मासतकके कालको छोड़कर सोलह मासतकके