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Read in context| ५३२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड- |
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हट जाता था, इसलिये यह शीघ्रग नामका प्रेत हुआ। अन्नादिकी आकांक्षासे इसने बहुत-से ब्राह्मणोंको पीड़ित किया था, इस कारण यह सूचीमुख नामक प्रेत हो गया। इसने पोष्यवर्ग एवं ब्राह्मणोंको दिये बिना अकेले ही मिष्टान्न खाया था, इसलिये इसको रोधक कहा गया है। यह कुछ माँगनेपर मौन धारण करके पृथ्वी कुरेदने लगता था, अतः उस कर्मफलके अनुसार यह लेखक कहलाया।
हे ब्राह्मण! कर्मभावसे ही प्रेतत्व और इस प्रकारके नामकी प्राप्ति हुई है। यह लेखक मेषमुख, रोधक पर्वताकार मुखवाला, शीघ्रग पशुकी तरह मुखवाला और सूचक सुईके समान मुखवाला है, इसके बेढंगे रूपको देखें। हे नाथ! हम अत्यन्त दुःखित हैं। मायावी रूप बनाकर हम लोग पृथ्वीपर विचरण करते हैं। हम सभी अपने ही कर्मसे विकृत आकारवाले, लम्बे ओठवाले, विकृत मुखवाले और बृहद् शरीरवाले तथा भयावह हो गये हैं। हे विप्र! यह सब मैंने आपसे प्रेतत्वका कारण बता दिया है। आपके दर्शनसे हम सभीमें ज्ञान उत्पन्न हो गया है, आपकी जिस बातको सुननेकी अभिरुचि हो, वह आप पूछें, उसे मैं आपको बतानेके लिये तैयार हूँ।
ब्राह्मणने कहा— हे प्रेतराज! पृथ्वीपर जो भी जीव जीते हैं, वे सब आहारसे ही जीवित रहते हैं। यथार्थरूपमें तुम लोगोंके भी आहारको सुननेकी मेरी इच्छा है।
प्रेतोंने कहा— हे द्विजराज! यदि आपकी श्रद्धा हमारे आहारको जाननेकी है तो सावधान हो करके आप सुनें।
हम सभीका आहार समस्त प्राणियोंके लिये निन्दनीय है, जिसको सुनकर आप बार-बार निन्दा करेंगे। प्राणियोंके शरीरसे निकले हुए कफ, मूत्र और पुरीषादि मल एवं अन्य प्रकारसे उच्छिष्ट भोजन प्रेतोंका आहार है। जो घर अपवित्र रहते हैं, जिनकी घरेलू सामग्रियाँ इधर-उधर बिखरी रहती हैं, जिन घरोंमें प्रसूतादिके कारण मलिनता बनी रहती है, वहींपर प्रेत भोजन करते हैं। जिस घरमें सत्य, शौच और संयम नहीं होता, पतित एवं दस्युजनोंका साथ है, उसी घरमें प्रेत भोजन करते हैं। जो घर भूतादिक बलि, देवमन्त्रोच्चार, अग्निहोत्र, स्वाध्याय तथा व्रतपालनसे हीन है, प्रेत उसमें ही भोजन करते हैं। जो घर लज्जा एवं मर्यादासे रहित है, जिसका स्वामी स्त्रीसे जीत लिया गया है, जहाँ माता-पिता और गुरुजनोंकी पूजा नहीं होती है, प्रेत वहाँ ही भोजन करते हैं। जिस घरमें नित्य लोभ, क्रोध, निद्रा, शोक, भय, मद, आलस्य तथा कलह—ये सब दुर्गुण विद्यमान रहते हैं, वहाँ प्रेत भोजन करते हैं। हे दृढ़व्रत तपोनिधि विप्रदेव! हम सब इस प्रेतभावसे दुःखित हैं, जिससे प्रेतयोनि प्राप्त न हो वह हमें बतायें। प्राणीकी नित्य मृत्यु हो वह अच्छा है पर उसे कभी भी प्रेतयोनि न प्राप्त हो।
ब्राह्मणने कहा— नित्य उपवास रखकर कृच्छ्र एवं चान्द्रायणव्रतमें लगा हुआ तथा अनेक प्रकारसे अन्य व्रतोंसे पवित्र मनुष्य प्रेत नहीं होता है। जो व्यक्ति जागरणसहित एकादशीव्रत करता है और अन्य सत्कर्मोंसे अपनेको पवित्र रखता है, वह प्रेत नहीं होता है। जो प्राणी अश्वमेधादि यज्ञोंको सम्पन्न करके नाना प्रकारके दान देता है तथा क्रीडा, उद्यान, वापी एवं जलाशयका निर्माता है, ब्राह्मणकी कन्याओंका यथाशक्ति विवाह कराता है, विद्यादान और अशरणको शरण देनेवाला है, वह प्रेत नहीं होता है।*
* उपवासपरो नित्यं कृच्छ्रचान्द्रायणे रतः। व्रतैश्च विविधैः पूतो न प्रेतो जायते नरः ॥
एकादश्यां व्रतं कुर्वञ्जागरेण समन्वितम्। अपरैः सुकृतैः पूतो न प्रेतो जायते नरः ॥
इष्ट्वा वै वाश्वमेधादीन् दद्याद् दानानि यो नरः। आरामोद्यानवाप्यादेः प्रपायाश्चैव कारकः ॥
कुमारीं ब्राह्मणानां तु विवाहयति शक्तितः। विद्यादोऽभयदश्चैव न प्रेतो जायते नरः ॥ (२२।६४-६७)