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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 543 of 634

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Page 543

प्रेतकल्प ] प्रेतबाधाजन्य विविध स्वप्न तथा उसका प्रायश्चित्तविधान ५३३

खाये हुए शूद्रान्नके जठरस्थित रहते हुए जिसकी मृत्यु हो जाती है या जो दुर्मृत्युसे मरता है, वह प्रेत होता है। जो अयाज्यका याजक तथा मद्यपीका साथ करके मदिरा पीनेवाली स्त्रीका संसर्ग करता है और अज्ञानवश भी मांस खाता है, वह प्रेत होता है। जो देवता, ब्राह्मण और गुरुके धनका अपहारक है, जो धन लेकर अपनी कन्या देता है, वह प्रेत होता है। जो माता, भगिनी, स्त्री, पुत्रवधू तथा पुत्रीका बिना कोई दोष देखे परित्याग कर देता है, उसे भी प्रेत होना पड़ता है। जो विश्वासपर रखी हुई परायी धरोहरका अपहर्ता है, मित्रद्रोही है, सदैव परायी स्त्रीमें अनुरक्त रहता है, विश्वासघाती और कपटी है, वह प्रेतयोनिमें जाता है, जो प्राणी भ्रातृद्रोही, ब्रह्महन्ता, गोहन्ता, मद्यपी, गुरुपत्नीगामी, इनका संसर्गी और वंशपरम्पराका परित्याग करके सदा झूठ बोलता रहता है, स्वर्णकी चोरी तथा भूमिका अपहरण करता है, वह प्रेत होता है।*

**भीष्मने कहा—**हे युधिष्ठिर ! इस प्रकार ब्राह्मण संतसक ऐसा कह ही रहा था कि आकाशमें दुन्दुभि बजने लगी। देवोंने उस ब्राह्मणके ऊपर फूलोंकी वर्षा की। प्रेतोंके लिये वहाँ पाँच देवविमान आ गये। विधिवत् उस ब्राह्मणकी आज्ञा लेकर वे सभी प्रेत दिव्य विमानोंमें बैठकर स्वर्ग चले गये। इस प्रकार ब्राह्मणके द्वारा प्राप्त ज्ञान एवं उसके साथ सम्भाषण एवं पुण्य-संकीर्तनके प्रभावसे उन सभी प्रेतोंका पाप विनष्ट हो गया और उन्हें परम पदकी प्राप्ति हुई।

**सूतजीने कहा—**इस आख्यानको सुनकर गरुड़जी पीपल-पत्रके समान काँप उठे। उन्होंने पुनः मनुष्योंके कल्याणके लिये श्रीभगवान् विष्णुसे पूछा।

(अध्याय २२)


प्रेतबाधाजन्य विविध स्वप्न तथा उसका प्रायश्चित्तविधान

**श्रीगरुड़ने कहा—**हे देवेश ! पिशाचयोनिमें रहनेवाले प्रेत क्या-क्या करते हैं ? वे क्या कहते हैं ? उसे आप कहिये।

**श्रीभगवान्‌ने कहा—**हे पक्षिराज ! उनका जैसा स्वरूप है, जो उनकी पहचान है और जिस प्रकार वे स्वप्न दिखाते हैं, वह सब मैं तुम्हें सुनाता हूँ। भूख-प्याससे दुःखित वे अपने घरमें प्रवेश करते हैं। उसी वायुरूपी देहमें प्रविष्ट होकर अपने वंशजोंको अपना चिह्न दिखाते हैं। प्रेत अपने पुत्र, अपनी स्त्री तथा अपने बन्धु-बान्धवोंके पास


* देवद्रव्यं च ब्रह्मस्वं गुरुद्रव्यं तथैव च। कन्यां ददाति शुक्लेन स प्रेतो जायते नरः॥
मातरं भगिनीं भार्यां स्नुषां दुहितरं तथा। अदृष्टदोषास्त्यजति स प्रेतो जायते नरः॥
न्यासापहर्ता मित्रध्रुक्परदाररतः सदा। विश्वासघाती कूटश्च स प्रेतो जायते नरः॥
भ्रातृध्रुग्ब्रह्महा गोघ्नः सुरापो गुरुतल्पगः। कुलमार्गं परित्यज्य ह्यनृतोक्तौ सदा रतः।
हर्ता हेम्नश्च भूमेश्च स प्रेतो जायते नरः॥ (२२। ७१–७४)