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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 541 of 634

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Page 541

प्रेतकल्प ] प्रेतयोनि दिलानेवाले निन्दित कर्म ५३१


भ्रमित न हो सकूँ।

भीष्मने कहा—हे वत्स! मनुष्यको जैसे प्रेतयोनि प्राप्त होती है, वह जैसे उस योनिसे मुक्त होता है, जैसे वह दुस्तर घोर नरकमें जाता है, नरकमें जाकर दुःख झेल रहे प्राणियोंको जिसका नाम, गुण, कीर्तन और श्रवण करनेसे मुक्ति प्राप्त होती है, वह सब मैं तुम्हें बता रहा हूँ।

हे पुत्र! ऐसा सुना जाता है कि प्राचीनकालमें एक ख्यातिलब्ध संतसक नामक सुव्रत तपस्वी ब्राह्मण वनमें रहता था। दयावान्, योगयुक्त, स्वाध्यायरत, अग्निहोत्री उस द्विजश्रेष्ठका समय सदैव यज्ञादिक धार्मिक कृत्योंमें बीतता था। परलोकका भय उसे बहुत था, अतः ब्रह्मचर्य, सत्य, शौचका पालन करते हुए और निर्मलचित्त होकर वह तपस्यामें संलग्न रहता था। श्रद्धापूर्वक गुरुके उपदेश, अतिथि-पूजन तथा आत्मतत्त्वके चिन्तनमें अनुरक्त वह तपस्वी सांसारिक द्वन्द्वोंसे रहित था। इस संसारको जीतनेकी इच्छासे योगाभ्यासमें सदैव अपनेको वह समर्पित रखता था। इस प्रकारका आचरण करते हुए उस जितेन्द्रिय मुमुक्षु ब्राह्मणको वनमें ही बहुत-से वर्ष बीत गये। एक दिन तपस्वी संतसकके मनमें तीर्थाटनकी इच्छा उत्पन्न हुई। उसने मनमें यह संकल्प किया कि अब मैं तीर्थोंके पवित्र जलसे इस शरीरको पवित्र बनाऊँगा, अनन्तर वह स्नान तथा जप-नमस्कारादि कृत्योंको सम्पन्न कर सूर्योदय होनेपर वह तीर्थ-यात्रापर निकल पड़ा।

चलते-चलते वह महातपस्वी ब्राह्मण मार्ग भूल गया। भ्रान्त मार्गमें चलते हुए उसे अत्यन्त भयानक पाँच प्रेत दिखायी पड़े। उस निर्जन वनमें विकृत शरीरवाले भयंकर प्रेतोंको देखकर ब्राह्मणका हृदय कुछ भयभीत हो उठा। अतः वहींपर खड़े होकर वह विस्फारित नेत्रोंसे उसी ओर देखता रहा। तत्पश्चात् ब्राह्मणने अपने भयको दूरकर धैर्यका सहारा लिया और मधुर भाषामें पूछा—'हे विकृत मुखवालो! तुम सब कौन हो? कैसा पापकर्म तुम लोगोंने किया है, जिसके फलस्वरूप तुम्हें यह विकृति प्राप्त हुई है? तुम सब कहाँ जानेका निश्चय कर रहे हो?'

प्रेतराजने कहा—हे द्विजश्रेष्ठ! हम सभीने अपने-अपने कर्मके कारण प्रेतयोनिको प्राप्त किया है। परद्रोहमें रत होनेके कारण हम पाप और मृत्युके वशमें हुए। नित्य भूख-प्याससे पीड़ित रहकर यह प्रेत-जीवन बिता रहे हैं। हम लोगोंकी वाणी उसी पापसे विनष्ट हुई है, शरीर कान्तिहीन हो गया है, हम संज्ञाहीन और विकृत चित्तवाले हो गये हैं। हे तात! हमें दिशाओं तथा विदिशाओंका कोई ज्ञान नहीं है। पाप-कर्मसे पिशाच बने हुए हम मूढ़ प्राणी कहाँ जा रहे हैं, इसका भी ज्ञान हमें नहीं है। हम लोगोंके न माता हैं और न पिता हैं। अपने कर्मोंके फलस्वरूप, अत्यन्त दुःखदायी यह प्रेतयोनि हम सभीको प्राप्त हुई है। हे ब्रह्मन्! आपके दर्शनसे हम लोग अत्यधिक प्रसन्न हैं। आप मुहूर्तभर रुकें। आपसे हम अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त प्रारम्भसे कहेंगे। उनमेंसे एक प्रेतने कहा—

हे विप्रदेव! मेरा नाम पर्युषित है, यह दूसरा सूचीमुख है, तीसरा शीघ्रग, चौथा रोधक और पाँचवाँ लेखक है।

ब्राह्मणने कहा—हे प्रेत! प्राणीको कर्मफलानुसार प्रेतयोनि मिलती है यह तो ठीक बात है, पर अपने जो नाम तुम बताते हो, उसके प्राप्त होनेका क्या कारण है?

प्रेतराजने कहा—हे द्विजश्रेष्ठ! मैंने सदैव सुस्वादु भोजन किया और ब्राह्मणको बासी अन्न दिया है, इस कारण मेरा नाम पर्युषित (बासी) है। भूखे ब्राह्मणकी याचनाको सुनकर यह शीघ्र ही वहाँसे