गरुड़ पुराण
Garuda Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in contextकाण्ड ] सर्पोंके विष हरनेके उपाय तथा दुष्ट उपद्रवोंको दूर करनेके मन्त्र ४३
अर्थात् यमराजकी गतिके समान गतिमान् रहता है।
रात्रि और दिनका मान लगभग तीस-तीस घटिका होता है। इस मानके अनुसार निर्मित कालचक्रमें चन्द्रमा प्रतिपदा तिथिको पादाङ्गुष्ठ, द्वितीयाको पैरसे ऊपर, तृतीयाको गुल्फ, चतुर्थीको जानु, पञ्चमीको लिङ्ग, षष्ठीको नाभि, सप्तमीको हृदय, अष्टमीको स्तन, नवमीको कण्ठ, दशमीको नासिका, एकादशीको नेत्र, द्वादशीको कान, त्रयोदशीको भौंह, चतुर्दशीको शंख अर्थात् कनपटी तथा पूर्णिमा एवं अमावस्याको मस्तकपर निवास करता है। पुरुषके दक्षिणाङ्गमें तथा स्त्रीके वामभागमें चन्द्रकी स्थिति होती है। चन्द्रकी स्थिति जिस अङ्गमें होती है, उस अङ्गमें सर्पके डसनेपर प्राणी जीवित बच सकता है। यद्यपि सर्पदंशसे शरीरमें उत्पन्न हुई मूर्च्छा शीघ्र समाप्त होनेवाली नहीं है, फिर भी शरीर-मर्दनसे वह दूर हो सकती है।
स्फटिकके समान निर्मल 'ॐ हंसः' नामक बीजमन्त्र, साधकका परम मन्त्र है। विषरूपी पापको नष्ट करनेमें समर्थ इस बीज-मन्त्रका प्रयोग सर्पदंशसे मूर्च्छित प्राणीपर करना चाहिये। इसके चार प्रकार हैं। प्रथम मात्रा बीज बिन्दुसे युक्त है। दूसरा पाँच स्वरोंसे संयुक्त है। तीसरा छः स्वरोंवाला और चौथा विसर्गयुक्त है। प्राचीन समयमें पक्षिराज गरुडने तीनों लोकोंकी रक्षाके लिये 'ॐ कुरु कुले स्वाहा' इस महामन्त्रको आत्मसात् किया था। अतः सर्प एवं सर्पिणियोंके विषको शान्त करनेके लिये इच्छुक व्यक्तिको मुखमें 'ॐ', कण्ठमें 'कुरु', दोनों गुल्फोंमें 'कुले' तथा दोनों पैरोंमें 'स्वाहा' मन्त्रका न्यास करना चाहिये। जिस घरमें उपर्युक्त मन्त्र भली प्रकारसे लिखा रहता है, सर्प उस घरको छोड़कर चले जाते हैं। जो मनुष्य एक हजार बार इस मन्त्रके जपसे अभिमन्त्रित सूत्रको कानपर धारण करता है, उसको सर्प-भय नहीं रहता। जिस घरमें इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित शर्कराखण्ड फेंक दिये जाते हैं, उस घरको भी सर्प छोड़ देते हैं। देवताओं और असुरोंने इस मन्त्रका सात लाख जप करके सिद्धि प्राप्त की थी।
इसी प्रकार एक अष्टदल पद्मका रेखाङ्कनकर उसके प्रत्येक दलपर इस—'ॐ सुवर्णरेखे कुक्कुटविग्रहरूपिणि स्वाहा'—मन्त्रके दो-दो वर्ण लिखे तथा 'ॐ पक्षि स्वाहा'—इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलके द्वारा स्नान करानेसे विषविह्वल प्राणीका विष दूर हो जाता है।
'ॐ पक्षि स्वाहा' इस मन्त्रके द्वारा अङ्गुष्ठ-भागसे लेकर कनिष्ठापर्यन्त करन्यास तथा मुख-हृदय-लिङ्ग और पैरोंमें अङ्गन्यास करे तो विषधर नाग ऐसे मनुष्यकी छायाको स्वप्नमें भी लाँघ नहीं सकता। जो मनुष्य इस मन्त्रका एक लाख जप करके सिद्धि प्राप्त कर लेता है, वह अपनी दृष्टिमात्रसे व्यथित व्यक्तिके शरीरमें व्याप्त विषको नष्ट कर देता है।
'ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं भि (भी)रुण्डायै स्वाहा'—इस मन्त्रका जप सर्पदंशित व्यक्तिके कानमें करनेपर विषका प्रभाव क्षीण हो जाता है।
यदि दोनों पैरके अग्रभागमें 'अ आ', गुल्फमें 'इ ई' जानुमें 'उ ऊ', कटिमें 'ए ऐ', नाभिमें 'ओ', हृदयमें 'औ', मुखमें 'अं' तथा मस्तकमें 'अः' वर्णका स्थापनकर 'ॐ हंसः' बीजमन्त्रके सहित न्यास करके साधक इस बीजमन्त्रका ध्यान-पूजन और जप करे तो वह सर्प-विषको दूर कर सकता है।
'मैं (स्वयं) गरुड हूँ' यह ध्यान (भावना) करके साधकको विष-शमनका कार्य करना चाहिये। 'हं' बीजमन्त्रका शरीरमें विन्यास विषादिका हरण करनेवाला कहा गया है। वाम हाथमें 'हंसः' मन्त्रका न्यास करके जो साधक इस मन्त्रका