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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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४२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

हुई वेदीपर चित्रित देवके ऊपर सुन्दर पुष्प अर्पित करे। द्वारपर अवस्थित रहनेवाले देवोंका आवाहन और पूजन करनेके लिये पहले आधारशक्तिकी पूजा करे। तदनन्तर देवताकी प्रतिष्ठा करके उनके (देव) परिवारका पूजन करना चाहिये; क्योंकि विद्वानोंने बतलाया है कि मुख्य देवके पूजाके साथ उसके अङ्ग-परिवार आदिकी भी पूजा करनेका विधान है। आयुधों एवं परिवारोंके साथ धर्म आदिकी तथा इन्द्र आदिकी, युगों, वेदों और मुहूर्तोंकी भी मुख्य देवके रूपमें पूजा करनी चाहिये। यह पूजा भुक्ति और मुक्ति प्रदान करनेवाली है। अतः साधक विद्वानोंको उनकी षडङ्ग-पूजा करनी चाहिये।

देवमण्डलकी पूजा करनेके पूर्व मातृका, गणदेवता, नन्दी और गङ्गाकी पूजा करके देवस्थानके देहली-भागपर महाकाल तथा यमुनाकी पूजा करनी चाहिये। इस पूजामें ‘ॐ अमृतेश्वर भैरवाय नमः।’ तथा ‘ॐ जुं हंसः सूर्याय नमः’ कहना चाहिये। इसी प्रकार प्रारम्भमें प्रणव मन्त्र ॐकारको जोड़कर नामोच्चार करते हुए अन्तमें ‘नमः’ शब्दका प्रयोग करके शिव, कृष्ण, ब्रह्मा, गण, चण्डिका, सरस्वती और महालक्ष्मी आदिकी पूजा करनी चाहिये।

(अध्याय १८)


सर्पोंके विष हरनेके उपाय तथा दुष्ट उपद्रवोंको दूर करनेके मन्त्र

( प्राणेश्वरी विद्या )

श्रीसूतजी बोले—हे ऋषियो! अब मैं शिवद्वारा पक्षिराज गरुडको सुनाये गये प्राणेश्वर महामन्त्रका वर्णन करता हूँ, किंतु उसके पूर्व उन स्थानोंका वर्णन करूँगा, जहाँ सर्पके काटनेसे प्राणी जीवित नहीं रह सकता।

श्मशान, वल्मीक (बाँबी), पर्वत, कुआँ और वृक्षके कोटर—इन स्थानोंमें स्थित सर्पके द्वारा काट लेनेपर यदि उस दाँत-लगे स्थानपर तीन प्रच्छन्न रेखाएँ बन जाती हैं तो वह प्राणी जीवित नहीं रहता है। षष्ठी तिथिमें, कर्क और मेष राशिमें आनेवाले नक्षत्रों तथा मूल, अश्लेषा, मघा आदि क्रूर नक्षत्रोंमें सर्पदंश होनेसे प्राणीका जीवन समाप्त हो जाता है तथा काँख, कटि, गला, सन्धि-स्थान, मस्तक या कनपटीके अस्थिभाग और उदरादिमें काटनेपर प्राणी जीवित नहीं रहता है।

यदि सर्पदंशके समय दण्डी, शस्त्रधारी, भिक्षु तथा नग्न प्राणीका दर्शन होता है तो उसे कालका ही दूत समझना चाहिये। हाथ, मुख, गर्दन और पीठमें सर्पके काटनेसे प्राणी जीवित नहीं बचता है।

दिनके प्रथम भागके पूर्व अर्ध यामका भोग सूर्य करता है। उस दिवाकर-भोगके पश्चात् गणनाक्रममें जो ग्रह आते हैं, उन ग्रहोंके द्वारा यथाक्रम शेष यामोंका भोग होता है। इस कालगतिमें प्रत्येक दिन छः परिवर्तनोंके साथ अन्य शेष ग्रहोंका भोग माना गया है। यथा—ज्योतिषियोंने काल-चक्रके आधारपर रात्रिकालमें शेषनाग ‘सूर्य’, वासुकि नाग ‘चन्द्र’, तक्षक नाग ‘मङ्गल’, कर्कोटक नाग ‘बुध’, पद्म नाग ‘गुरु’, महापद्म नाग ‘शुक्र’, शंख नाग ‘शनि’ और कुलिक नाग ‘राहु’ को स्वीकार किया।

रात या दिनमें बृहस्पतिका भोगकाल आनेपर सर्प, देवोंका भी अन्त करनेवाला हो जाता है। अतः इस कालमें सर्पद्वारा काटा गया प्राणी बच नहीं सकता है। दिनमें शनि-ग्रहकी वेलाके आनेपर राहु अशुभ धर्मसे संयुक्त रहता है। अतः वह अपने यामार्थ भोग और सन्धिकालकी अवस्थामें काल