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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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४४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

ध्यान-पूजन और जप करता है, वह सर्प-विषको दूर करनेमें समर्थ होता है; क्योंकि यह मन्त्र विषधर नागोंके नासिकाभाग और मुँहकी श्वास-नलिकाको भी रोकनेमें पूर्ण समर्थ है। यह मन्त्र शरीरकी त्वचा-मांस आदिमें व्यास सर्प-विषको भी विनष्ट कर देता है।

सर्पदंशसे मूर्च्छित प्राणीके शरीरमें 'ॐ हंसः' मन्त्रका न्यास करके भगवान् नीलकण्ठ आदि देवोंका भी ध्यान करना चाहिये। ऐसा करनेसे यह मन्त्र अपनी वायु शक्तिके द्वारा उस सम्पूर्ण विषका हरण कर लेता है।

प्रत्यङ्गिराकी जड़को चावलके जलके साथ पीसकर पीनेसे विषका प्रभाव दूर हो जाता है। पुनर्नवा, प्रियंगु, वक्त्रज (ब्राह्मी), श्वेत, बृहती, कूष्माण्ड, अपराजिताकी जड़, गेरू तथा कमलगट्टेके फलको जलमें पीसकर घृतके साथ लेप तैयार करना चाहिये, इस प्रकार बना हुआ लेप भी शरीरमें लगानेसे विषको शान्त कर देता है। सर्पके काटनेपर जो मनुष्य उष्ण (गरम) घृतका पान कर लेता है, उसके शरीरमें विषका अधिक प्रभाव नहीं बढ़ता। सर्पदंश होनेपर शिरीष नामक वृक्षके पञ्चाङ्ग (पत्र, पुष्प, फल, मूल एवं छाल)-के सहित गाजरके बीजोंको पीसकर सर्वाङ्गमें लेप करनेसे अथवा पीनेसे भी विषका प्रभाव समाप्त हो जाता है।

'ॐ ह्रीं' बीजमन्त्र, गोनस (गोहअन) आदि विषैले सर्पोंके विषको दूर करनेमें समर्थ है। इस मन्त्रके साथ 'अः'-का प्रयोगकर अर्थात् 'ॐ ह्रीं अः' का उच्चारण करते हुए हृदय, ललाट आदिमें विन्यास करके उसका ध्यान करनेमात्रसे ही सर्पादिका वशीकरण हो जाता है। इसका पंद्रह हजार जप करके साधक गरुडके समान सर्वगामी, कवि—विद्वान्, वेदविद् हो जाता है तथा दीर्घ आयुको प्राप्त करता है।

**सूतजीने पुनः कहा—**ऋषियो! अब मैं आप सभीको शिवके द्वारा कथित अत्यन्त गोपनीय मन्त्रोंको बताऊँगा; जिनसे अभिमन्त्रित पाश, धनुष, चक्र, मुद्गर, शूल और पट्टिश नामक आयुधोंको धारण करके राजा शत्रुओंपर भी विजय प्राप्त कर लेता है।

मन्त्रोद्धारके लिये कमल-पत्रपर अष्टवर्ग बनाकर पूर्व (दिशा)-से शुरू करके क्रमशः ईशान-कोणतक बीजमन्त्र (ॐ ह्रीं ह्रीं)-को लिखना चाहिये। **'ॐ'**कार ब्रह्मबीज है, **'ह्रीं'**कार विष्णुबीज है और 'ह्रीं' कार शिवबीज है। त्रिशूलके तीनों शीर्षपर 'ह्रीं' लिखकर क्रमानुसार न्यास करे। मन्त्र 'ॐ ह्रीं ह्रीं' है।

साधक हाथमें शूल ग्रहण करे। तत्पश्चात् उसको आकाशमें घुमाये, जिसे देखते ही दुष्ट ग्रह और सर्प नष्ट हो जाते हैं। साधक धूम्रवर्णके धनुषको हाथमें लेकर आकाशकी ओर भुजा उठाकर इस मन्त्रका चिन्तन करे। ऐसा करनेसे दुष्ट विषैले सर्प, कुत्सित ग्रह, विनाशकारी मेघ और राक्षस नष्ट होते हैं। यह मन्त्र तो त्रिलोककी रक्षा करनेमें समर्थ है, मृत्युलोकके विषयमें कहना ही क्या है?

'ॐ जूं सूं हूं फट्' यह दूसरा मन्त्र है। साधक खैरकी आठ लकड़ियोंको इसी मन्त्रसे अभिमन्त्रित कर उन्हें आठ दिशाओंमें गाड़ दे तो उस कीलाङ्कित क्षेत्रमें वज्रपात (विद्युत्-निपात) तथा इसकी गर्जनाका उपद्रव नहीं होता। गरुडद्वारा कहे गये इस मन्त्रसे आठ कीलोंको इक्कीस बार अभिमन्त्रितकर रात्रिके समय अपने अभीष्ट क्षेत्रकी चारों दिशाओं और विदिशाओंमें गाड़ देना चाहिये। इससे भी वहाँ विद्युत्-निपात, वज्रपतन तथा चूहा, टिड्डी आदिसे होनेवाले उपद्रवोंका भय नहीं रहता।