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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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Page 486
४७६संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

प्रत्येक बारह मासके बारह पिण्ड, ऊनमासिक (आद्य) त्रैपाक्षिक, ऊनषाण्मासिक एवं ऊनाब्दिक—इन्हें मतभेदसे तृतीय अथवा उत्तमषोडशी भी कहा जाता है।

बारहवें दिन, तीन पक्षमें, छः महीनेमें अथवा वर्षके अन्तमें सपिण्डीकरण करना चाहिये। जिस मृतकके निमित्त इन षोडश श्राद्धोंको सम्पन्न करके ब्राह्मणोंको दान नहीं दिया जाता है, उस प्रेतके लिये अन्य सौ श्राद्ध करनेपर भी मुक्ति प्राप्त नहीं होती। हे खगेश! मृतक व्यक्तिके एकादशाह अथवा द्वादशाह तिथिमें आद्यश्राद्ध करनेका विधान माना गया है। प्रतिमासका श्राद्ध मासके आद्यतिथिमें मृत-तिथिपर होना चाहिये। ऊनश्राद्ध (ऊनमासिक, ऊनषाण्मासिक तथा ऊनाब्दिक)—मास, छठें मास और वर्षमें एक, दो अथवा तीन दिन कम रहनेपर करना चाहिये<sup>१</sup>। सपिण्डीकरण वर्ष पूर्ण होनेके बाद अथवा छः महीने बाद करना चाहिये अथवा आभ्युदयिक (विवाहादि मङ्गल-कार्य अनिवार्य रूपसे उपस्थित होनेपर) कार्य आनेपर तीन पक्ष अथवा बारह दिनके बाद करना चाहिये। मनुष्योंके कुलधर्म असंख्य हैं, उनकी आयु भी क्षरणशील है और शरीर अस्थिर है। अतः बारहवें दिन सपिण्डीकरण करना उत्तम है।

हे पक्षिराज! सपिण्डीकरण श्राद्धोंके सम्पादकीय विधि भी मुझसे सुनो।

हे काश्यप! एकोद्दिष्ट विधानके अनुसार यह कार्य करना चाहिये<sup>२</sup>। तिल, गन्ध और जलसे परिपूर्ण चार पात्रोंकी व्यवस्था करके एक पात्र प्रेतके निमित्त और शेष तीन पात्र पितृगणोंके लिये निश्चित करना चाहिये। तदनन्तर उन तीन पात्रोंमें प्रेतपात्रके जलका सेचन करे। चार पिण्ड बनाये और प्रेत-पिण्डका उन तीन पिण्डोंमें मेलन कर दे। तबसे वह प्रेत पितरके रूपमें हो जाता है। हे खगेश्वर! उस प्रेतमें पितृत्वभावके आ जानेके बाद उस प्रेत तथा अन्य उसके पितृ-पितामह आदि पितरोंका समस्त श्राद्धकृत्य श्राद्धकी सामान्य विधिके अनुसार ही करना चाहिये। मृत पतिके साथ एक ही चितामें प्रवेश और एक ही दिन दोनोंकी मृत्यु होनेपर स्त्रीका सपिण्डीकरण नहीं होता है। उसके पतिके सपिण्डीकरण श्राद्धसे ही स्त्रीका सपिण्डीकरण श्राद्ध सम्पन्न हो जाता है। हे खगेश! पतिके मरनेके बाद स्त्रीकी मृत्यु होनेपर स्त्रीका सपिण्डन पतिके साथ होगा और सहमृत्युकी दशामें दोनोंके श्राद्धके लिये एक पाक, एक समय तथा एक कर्ता होगा। किंतु श्राद्ध पति-पत्नीका पृथक्-पृथक् ही किया जाना चाहिये। यदि स्त्री पतिके साथ चितामें


१-(क) एकद्वित्रिदिनैरूने त्रिभागेनोने एव वा। श्राद्धान्यूनाब्दिकादीनि कुर्यादित्याह गौतमः॥
नन्दायां भार्गवदिने चतुर्दश्यां त्रिपुष्करे। ऊनश्राद्धं न कुर्वीत गृही पुत्रधनक्षयात्॥ (गार्ग्य)
द्विपुष्करे च नन्दायां सिनीवाल्यां भृगोर्दिने। चतुर्दश्यां च नो तानि कृतिकासु त्रिपुष्करे॥
एक, दो, तीन अथवा दस दिन कम रहनेपर, नन्दा तिथिको, शुक्रवारको, चतुर्दशी तिथि, त्रिपुष्कर और द्विपुष्कर योग, अमावास्या तिथि, कृत्तिका, रोहिणी तथा मृगशिरा तिथियोंमें ऊनश्राद्ध (ऊनमासिक, ऊनषाण्मासिक, ऊनाब्दिक) नहीं करना चाहिये।
(ख) 'सपिण्डीकरणं चैव' इस वाक्यसे तृतीय षोडशीके अन्तर्गत सपिण्डीमें किये जानेवाले प्रेतश्राद्धकी गणना करनेपर 'शताद्धेन तु मेलयेत्' इस वाक्यसे विरोध होता है। सपिण्डीकरणमें किये जानेवाले प्रेतश्राद्धको तृतीय षोडशीके अन्तर्गत कात्यायनने माना है। इसका 'शतार्धेन तु मेलयेत्' से विरोध है।
श्राद्धकल्पलतामें तथा आचार्य गोभिल, लौगाक्षि पैठिनसिके मतमें सपिण्डन श्राद्ध तृतीय षोडशीके बाहर है।
(ग) 'द्वादशप्रतिमास्यानि' इस पदसे प्रथम मासिका बोध हो जानेके कारण आद्य पदके अर्थमें ऊनमासिक उपलक्षण है। इसी प्रकार 'षाण्मासिक' पदका ऊनषाण्मासिक और ऊनाब्दिक अर्थमें लाक्षणिक प्रयोग है।
२-सपिण्डीकरणके अन्तर्गत किये जानेवाले केवल प्रेतश्राद्धके उद्देश्यसे एकोद्दिष्ट विधिका उल्लेख है। इस श्राद्धके अन्तर्गत किया जानेवाला प्रेतके पिता आदिका श्राद्ध सदैव पार्वण-विधिसे किया जाना चाहिये।