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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

Page 485 of 634

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Page 485

प्रेतकल्प ] आशौचमें विहित कृत्य, आशौचकी अवधि तथा दशगात्रविधि ४७५

हे पक्षिश्रेष्ठ! पुत्रादि दस दिनोंतक जो पिण्डदान करते हैं, वे प्रतिदिन चार भागोंमें विभाजित हो जाते हैं। उसमें प्रथम दो भागसे आतिवाहिक शरीर, तीसरे भागसे यमदूत और चौथे भागसे वह मृतक स्वयं तृप्त होता है।

नौ दिन और रात्रिमें वह शरीर अपने अंगोंसे युक्त हो जाता है। प्रथम पिण्डदानसे प्रेतके शिरोभागका निर्माण होता है। दूसरे पिण्डदानसे उसके कान-नेत्र और नाककी सृष्टि होती है। तीसरे पिण्डदानसे क्रमशः—कण्ठ, स्कन्ध, बाहु एवं वक्षःस्थल, चौथे पिण्डदानसे नाभि, लिंग और गुदाभाग तथा पाँचवें पिण्डदानसे जानु, जंघा और पैर बनते हैं। इसी प्रकार छठें पिण्डदानसे सभी मर्मस्थल, सातवें पिण्डदानसे नाड़ीसमूह, आठवें पिण्डदानसे दाँत और लोम तथा नवें पिण्डदानसे वीर्य एवं दसवें पिण्डदानसे उस शरीरमें पूर्णता, तृप्ति और भूख-प्यासका उदय होता है—

अहोरात्रैस्तु नवभिर्देहो निष्पत्तिमाप्नुयात् ।
शिरस्त्वाद्येन पिण्डेन प्रेतस्य क्रियते तथा ॥
द्वितीयेन तु कर्णाक्षिनासिकं तु समासतः ।
गलांसभुजवक्षश्च तृतीयेन तथा क्रमात् ॥
चतुर्थेन च पिण्डेन नाभिलिङ्गगुदं तथा ।
जानुजंघं तथा पादौ पञ्चमेन तु सर्वदा ॥
सर्वमर्माणि षष्ठेन सप्तमेन तु नाडयः ।
दन्तलोमान्यष्टमेन वीर्यन्तु नवमेन च ॥
दशमेन तु पूर्णत्वं तृप्तता क्षुद्विपर्ययः ।
(५।३३—३७)

हे वैनतेय! अब मैं मध्यमषोडशी विधिका वर्णन करता हूँ। उसको सुनो।

विष्णुसे आरम्भ करके विष्णुपर्यन्त एकादश श्राद्ध तथा पाँच देवश्राद्ध इस प्रकार षोडश श्राद्ध किये जाते हैं। इन्हींका नाम मध्यमषोडशी है। यदि प्रेतकल्याणके निमित्त ‘नारायणबलि’ की जाय तो उसको एकादशाहके दिन करना चाहिये और उसी दिन वहींपर वृषोत्सर्ग भी करना चाहिये। जिस जीवका ग्यारहवें दिन वृषोत्सर्ग नहीं होता, सैकड़ों श्राद्ध करनेपर भी उस जीवकी प्रेतत्वसे मुक्ति नहीं होती है। वृषोत्सर्ग बिना किये ही जो पिण्डदान किया जाता है, वह पूर्णतया निष्फल होता है। उससे प्रेतका कोई उपकार नहीं होता।* इस पृथ्वीपर वृषोत्सर्गके बिना कोई अन्य उपाय नहीं है, जो प्रेतका कल्याण करनेमें समर्थ हो। अतः पुत्र, पत्नी, दौहित्र (नाती), पिता अथवा पुत्रीको स्वजनकी मृत्युके पश्चात् निश्चित ही वृषोत्सर्ग करना चाहिये। चार बछियोंसे युक्त, विधानपूर्वक अलंकृत वृष, जिसके निमित्त छोड़ा जाता है उसको प्रेतत्वकी प्राप्ति नहीं होती। यदि एकादशाहके दिन यथाविधान साँड़ उत्सर्ग करनेके लिये उपलब्ध नहीं है तो विद्वान् ब्राह्मण कुश या चावलके चूर्णसे साँड़का निर्माण करके उसका उत्सर्ग कर सकता है। यदि बादमें भी वृषोत्सर्गके समय किसी प्रकार साँड़ नहीं मिल रहा है तो मिट्टी या कुशसे ही साँड़का निर्माण करके उसका उत्सर्ग करना चाहिये। जीवनकालमें प्राणीको जो भी पदार्थ प्रिय रहा हो उसका भी दान इसी एकादशाह श्राद्धके दिन करना उचित है। इसी दिन मरे हुए स्वजनको उद्देश्य बनाकर शय्या, गौ आदिका दान भी करना चाहिये। इतना ही नहीं उस प्रेतकी क्षुधा-शान्तिके लिये बहुतसे ब्राह्मणोंको भोजन भी कराना चाहिये।

हे विनतापुत्र गरुड! अब मैं तृतीय षोडशी (उत्तम-षोडशी)-श्राद्धका वर्णन कर रहा हूँ, उसे सुनो।


* एकादशाहे प्रेतस्य यस्योत्सृज्येत नो वृषः। प्रेतत्वं सुस्थिरं तस्य दत्तैः श्राद्धशतैरपि॥
अकृत्वा यद्वृषोत्सर्गं कृतं वै पिण्डपातनम्। निष्फलं सकलं विद्यात्प्रमीताय न तद्भवेत्॥ (५।४०-४१)