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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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Page 487

प्रेतकल्प ] आशौचमें विहित कृत्य, आशौचकी अवधि तथा दशगात्रविधि ४७७


सती न होकर अन्य किसी दिन सती होती है तो उस स्त्रीकी मृत तिथिके आनेपर उसके लिये पृथक् रूपसे पिण्डदान करना चाहिये।

हे गरुड! सहमृत्युकी दशामें प्रत्येक वर्ष नवश्राद्ध एक साथ करना चाहिये। जिस मृतकका वार्षिक श्राद्धसे पूर्व सपिण्डीकरण हो जाता है, उसके लिये भी वर्षभर मासिक श्राद्ध और जलकुम्भ दान करना चाहिये<sup>१</sup>। धनका बँटवारा हो जानेपर भी नवश्राद्ध, सपिण्डन श्राद्ध और षोडश श्राद्ध करनेका अधिकार एक ही व्यक्तिको है।

हे कश्यपपुत्र! अब मैं तुम्हें नवश्राद्ध करनेका काल बताऊँगा। उसको सुनो।

हे पक्षिन्! मृत्युके दिन मृतस्थानपर पहला श्राद्ध करना चाहिये। उसके बाद दूसरा श्राद्ध मार्गमें उस स्थानपर करना चाहिये जहाँपर शव रखा गया था। तदनन्तर तीसरा श्राद्ध अस्थिसंचयनके स्थानपर होता है। इसके बाद पाँचवें, सातवें, आठवें, नवें, दसवें और ग्यारहवें दिन श्राद्ध होता है। इसलिये इन्हें नवश्राद्ध कहा जाता है। ये नवश्राद्ध तृतीया षोडशी कहे जाते हैं। इनको एकोद्दिष्ट विधानके अनुसार ही करना चाहिये। पहले, तीसरे, पाँचवें, सातवें, नवें और ग्यारहवें दिन होनेवाले श्राद्धोंको नवश्राद्ध कहा जाता है। दिनकी संख्या छः ही है पर छः दिनमें ही नवश्राद्ध हो जाते हैं। इस विषयमें ऋषियोंके बीच मतभेद हैं, इसी कारण मैंने उनको भी तुम्हें बता दिया।

श्राद्धोंका जो योग रूढिगत रूपसे है, वही मुझे भी अभीष्ट है। किसीको नव शब्दका यौगिक अर्थ अभीष्ट है। आद्य और द्वितीय श्राद्धमें एक ही पवित्रक देना चाहिये। जब ब्राह्मण भोजन कर चुके हों तो उसके बाद प्रेतको पिण्डदान देना उचित होता है<sup>२</sup>। वहाँपर यजमान और ब्राह्मणके बीच प्रश्नोत्तर भी होना चाहिये। जिसमें यजमान ब्राह्मणसे यह प्रश्न करे कि आप मेरी सेवासे प्रसन्न हैं? उसका उत्तर ब्राह्मण दे कि हाँ हम आपपर प्रसन्न हैं। आपके उस मृत स्वजनको अक्षय लोककी प्राप्ति हो।

हे पक्षिराज! अब तुम मुझसे एकोद्दिष्ट श्राद्धके विषयमें भी सुनो, जिसको वर्षपर्यन्त करना चाहिये।

सपिण्डीकरणके बादमें किये जानेवाले षोडश श्राद्धोंका सम्पादन एकोद्दिष्ट विधानके अनुसार ही होना चाहिये, किंतु पार्वण-श्राद्धमें उक्त नियमका प्रयोग नहीं होता है। जिस प्रकारसे प्रत्येक वर्षमें होनेवाला प्रत्यब्द श्राद्ध<sup>३</sup> होता है, उसी प्रकार उन षोडश श्राद्धोंको भी करना चाहिये। एकादशाह और द्वादशाहमें जो श्राद्ध किया जाता है उन दिनोंमें स्वयं प्रेत भी भोजन करता है। अतः स्त्री और पुरुषके लिये जो पिण्डदान इन दिनोंमें दिया जाय उसको अमुक प्रेतके निमित्त दिया जा रहा है, ऐसा कहकर पिण्डदान देना चाहिये। सपिण्डीकरण श्राद्ध होनेके पश्चात् प्रेत शब्दका प्रयोग नहीं होता है। एक वर्षतक घरके बाहर प्रतिदिन दीपक जलाना चाहिये। अन्न, दीप, जल, वस्त्र और अन्य जो कुछ भी वस्तुएँ दानमें दी जाती हैं, वे सभी सपिण्डीकरणतक प्रेत शब्दके सम्बोधनसे संकल्पित होनेपर ही प्रेतको तृप्ति प्रदान करती हैं।

हे वैनतेय! संक्षिप्त रूपमें मैंने वार्षिक कृत्य कह दिया। अब तुम विवस्वान् पुत्र यमराजके घर जिस प्रकार जीवका गमन होता है, उसका वर्णन सुनो।

हे अरुणानुज! त्रयोदशाह अर्थात् तेरहवें दिन


१-यस्य संवत्सरादर्वाक् सपिण्डीकरणं भवेत्। मासिकञ्चोदकुम्भञ्च देयं तस्यापि वत्सरम्॥ (५।६४)
२-यह प्रायः सपाक्षिकश्राद्धकी विधि है।
३-वार्षिक तिथिपर होनेवाला श्राद्ध।