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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

Page 347 of 634

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Page 347

काण्ड ] ग्रहणी, अतिसार, अग्निमान्द्य, छर्दि तथा अर्श आदि रोगोंका उपचार ३३७


साथ शर्कराका पान करना बुद्धिकारक होता है। हे शिव ! यदि पुरुष एक पल पुराना गुड़ प्रतिदिन (भोजन करनेके पश्चात्) खाता रहे तो वह बलवान् होकर अनेक स्त्रियोंसे सम्पर्क करनेकी क्षमता प्राप्त कर लेता है।

कुष्ठ (कूट)-को भलीभाँति चूर्ण करके घृत और मधुके साथ सोनेके समय खानेसे बलीपलित दूर हो जाता है। अलसी, उड़द, गेहूँ तथा पिप्पलीका चूर्ण घृतके साथ शरीरमें लगानेसे मनुष्य कामदेवके सदृश सौन्दर्यसम्पन्न हो जाता है।

यव, तिल, अश्वगन्धा, मूसली, सरला (काली तुलसी) और गुड़को परस्पर मिलाकर बनायी गयी वटी खानेसे मनुष्य तरुण तथा बलवान् हो जाता है। हींग, काला नमक और सोंठका काढ़ा बनाकर पीनेसे परिणाम नामक शूल और अजीर्ण रोग विनष्ट हो जाता है। धातकी (धवका फूल) तथा सोमराजी (औषधि) गोदुग्धके साथ पीसकर पान करनेसे दुर्बल मनुष्य भी मोटा हो जाता है। शक्ति चाहनेवाले प्राणीको शर्करा तथा मधुके साथ मक्खन खाना चाहिये। क्षयरोगसे पीड़ित व्यक्तिको दुग्धपान पुष्ट तथा बुद्धिको अत्यधिक प्रखर बना सकता है। गोदुग्धके साथ पान किया गया कुलीरका चूर्ण क्षयरोगको विनष्ट करता है।

भिलावा, विडंग, यवक्षार, सेंधा नमक, मैनसिल तथा शंखचूर्णको तेलमें पकाकर अनपेक्षित रोमसामूहोंको हटानेके लिये उसका प्रयोग करना चाहिये।

मुण्डीत्वक् (गोरखमुण्डी), वच, मोथा, काली मिर्च तथा तगरको एक साथ चबाकर मनुष्य तत्काल ही जिह्वासे अग्निको चाट सकता है। गोरोचन, भृंगराजका चूर्ण एवं घृत समान मात्रामें मिलाकर जलस्तम्भन किया जा सकता है।

हे महेश्वर! यष्टि-मधु (मुलेठी) एक पल, उष्ण जलके साथ पान करनेसे विष्टम्भिका तथा हृदयशूल नामक रोग नष्ट हो जाता है।

हे रुद्र! ‘ॐ हूं जः’ यह मन्त्र सभी प्रकारके बिच्छुओंका विष नष्ट करता है। पिप्पली, मक्खन, शृंगवेर, सेंधा नमक, कालीमिर्च, दही और कूटका नस्य लेने तथा उसका पान करनेपर वह विषदोषको दूर करता है। हे शिव ! त्रिफला, अदरक, कूट और चन्दनको घृतमें मिलाकर पान करने और लेप करनेसे बिच्छूका विष विनष्ट होता है। हे वृषभध्वज ! सेंधा नमक और त्रिकटुके चूर्णको दही, मधु तथा घृतमें मिलाकर लेप करनेसे यह बिच्छूके विषको दूर कर देता है।

हे रुद्र! ब्रह्मदण्डी और तिलका क्वाथ बनाकर उसके साथ त्रिकटु (सोंठ, पिप्पली तथा काली मिर्च) का चूर्ण पान करना चाहिये। यह सभी प्रकारके गुल्म एवं ऋतुकालीन अवरुद्ध रक्त-विकारका विनाशक है। मधु मिलाकर दूधका पान करनेसे रक्तस्रावके विकारको दूर किया जा सकता है। जंगली अडूसेकी जड़को पीसकर प्रसवकालमें स्त्रीके नाभि एवं गुह्यभागमें लेप करनेसे स्त्री सुखपूर्वक प्रसव करती है।

हे वृषध्वज ! चावलके पानीमें शर्करा और मधु मिलाकर पान करनेसे रक्तातिसार नामक रोग शान्त हो जाता है।
(अध्याय १८२)


ग्रहणी, अतिसार, अग्निमान्द्य, छर्दि तथा अर्श आदि रोगोंका उपचार

श्रीहरिने कहा— हे चन्द्रचूड! काली मिर्च, शृंगवेर और कुटजकी छालका पान करनेसे ग्रहणीरोग नष्ट होता है। पिप्पली, पिप्पलीमूल, काली मिर्च,तगर, वच, देवदारुका रस और पाठाको दूधके साथ पीसकर सेवन करनेसे निश्चित ही अतिसाररोग विनष्ट हो जाता है।