गरुड़ पुराण
Garuda Purana
by महर्षि वेदव्यास
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काली मिर्च तथा तिलके पुष्पोंका अञ्जन कामलारोगका विनाशक है। हरीतकी और गुड़को बराबर मात्रामें मधुके साथ मिलाकर खाना चाहिये। हे रुद्र! निस्संदेह यह विरेचनकारी होता है। त्रिफला, चित्रक, चित्र, कटुकरोहिणीका योग ऊरुस्तम्भ रोगका अपहारक है और यह विरेचनकी भी उत्तम औषधि है। हरीतकी, शृंगवेर, देवदारु, चन्दन, अपामार्ग (चिचड़ा)-की जड़को बकरीके दूधमें पकाकर पान करके ऊरुस्तम्भका विनाश किया जा सकता है अथवा जयन्ती (विष्णुक्रान्ता)-की जड़का क्वाथ पीनेसे भी यह रोग सात दिनमें दूर हो जाता है।
अनन्ता (धमासा) और शृंगवेरका समान भागमें चूर्ण बनाकर बराबर मात्रामें ही गुग्गुल और गुड़ मिला ले, तदनन्तर उसकी गोलियाँ बनाकर सेवन करनेसे स्नायुगत वायुविकार तथा अग्निमान्द्य रोग विनष्ट हो जाता है।
पुष्य नक्षत्रमें डंठल एवं पत्तियों-सहित शंखपुष्पीको उखाड़कर बकरीके दूधके साथ पीनेसे अपस्मार (मिरगी)-का रोग दूर होता है। समभागमें अश्वगन्धा तथा हरीतकीके चूर्णको जलके साथ पीनेसे निश्चित ही रक्त-पित्त-विकारका विनाश होता है। हरीतकी और कूटका चूर्ण बनाकर उसको मुखमें रखना चाहिये। पश्चात् शीतल जल पीनेसे सभी प्रकारके छर्दि रोग अर्थात् वमन दूर हो जाते हैं। गुडूची, पद्मकारिष्ट और नीम, धनिया तथा रक्तचन्दन नामक औषधियोंका योग पित्तश्लेष्मक ज्वर, छर्दि, दाह और तृष्णाके विकारका विनाशक एवं अग्निवर्धक है, किंतु इन औषधियोंका प्रयोग 'ॐ हुं नमः' इस मन्त्रसे अभिमन्त्रण करनेके पश्चात् | करना चाहिये—<br> ॐ जम्भिनी स्तम्भिनी मोहय सर्वव्याधीन् मे वज्रेण ठः ठः सर्वव्याधीन् मे वज्रेण फट्॥ (१८३। १२)<br> उपर्युक्त मन्त्रसे अभिमन्त्रित शंखपुष्पीको कानमें बाँधनेसे ज्वरको दूर किया जा सकता है। हे रुद्र! इसी मन्त्रसे १०८ बार जप करके अभिमन्त्रित शंखपुष्पीको रोगीके हाथमें रखकर वैद्य उसके नाखूनोंका स्पर्श करे तो चौथिया ज्वर अथवा अन्य सभी प्रकारके ज्वर विनष्ट हो जाते हैं।<br> जामुनका फल, हल्दी तथा साँपकी केंचुलका धूप सभी प्रकारके ज्वरोंका विनाशक है। यह धूप तो चौथिया ज्वरका भी विनाश कर देता है।<br> करवीर (कनेर), भृंगराज, नमक, कूट और कर्कट (काकड़ा सींगी) नामक औषधियोंको समान भागमें लेकर चौगुने गोमूत्रके साथ तैलपाक सिद्ध करना चाहिये। इस तेलका अभ्यङ्ग पामा, विचर्चिका तथा कुष्ठरोगके व्रणोंको दूर कर देता है।<br> हे रुद्र! पिप्पली और मधुका सेवन करने एवं मधुर भोजन करने तथा सूरणके सेवनसे प्लीहा रोग विनष्ट हो जाता है।<br> गोमूत्रके साथ पिप्पली और हल्दीका चूर्ण मिलाकर उसको गुदाद्वारमें डालनेसे अर्श रोग दूर किया जा सकता है।<br> बकरीका दूध और अदरखका चूर्ण मिलाकर पान करनेसे प्लीहा आदि रोग विनष्ट हो जाते हैं। सेंधा नमक, विडंग, सोमलता, सरसों, हल्दी, दारुहल्दी, विष और नीमकी पत्तीको गोमूत्रके साथ पीस लेना चाहिये। इसका लेप करनेसे कुष्ठरोगका विनाश होता है। (अध्याय १८३)