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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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Page 346
३३६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

नीमकी पत्तियाँ, पिप्पली, काली मिर्च, विडंगभद्र, मोथा और सोंठ—इन सात औषधियोंको गोमूत्रके साथ पीसकर वटी बना लेना चाहिये। इसकी एक वटी अजीर्ण और दो वटी विषूचिका (हैजा) नामक रोगको दूर करती है। मधुके साथ इसको घिसकर नेत्रोंमें लगानेसे पटोल अर्थात् परवलके समान आयी हुई सूजन दूर हो जाती है। गोमूत्रके साथ प्रयुक्त होनेपर अर्बुद (कैंसर) नामक रोगका नाश करती है। यह शंकरी वटी नेत्रोंके सभी रोग दूर करती है।

वच, जटामांसी, बिल्व, तगर, पद्मकेसर, नागकेसर और प्रियंगुको समान भागमें लेकर उनका चूर्ण बना लेना चाहिये। इस चूर्णका धूप लेनेसे मनुष्य रूप-सौन्दर्यसे समन्वित हो जाता है।

अर्जुन-वृक्षके फूल, भिलावा, विडंग, बला, राल, सौवीर और सरसोंके योगसे तैयार धूप सर्प, जुएँ, मक्खी तथा मच्छरोंको विनष्ट करता है।

श्रीहरिने पुनः कहा—हे शिव ! ताम्बूल, घृत, मधु तथा नमकको गोदुग्धके साथ ताम्रपात्रमें घिसकर सिद्ध किया गया अञ्जन नेत्रपीड़ाको दूर करनेका उत्तम योग है। खाँसी, श्वास तथा हिचकीका विकार होनेपर हरीतकी, वच, कूट, त्रिकटु अर्थात् विश्वा, उपकल्या, मरिच, हींग और मैनसिल-चूर्णको मधु तथा घृतमें मिलाकर चाटना चाहिये। | पिप्पली और त्रिफलाके चूर्णको मधुके साथ चाटनेसे भयंकर पीनस, खाँसी और श्वासके विकार नष्ट हो जाते हैं। हे वृषध्वज ! मूलसहित चित्रक तथा पिप्पलीके चूर्णको मधुमें मिलाकर चाटना चाहिये। यह श्वास, खाँसी और हिचकीको नष्ट कर देता है।

चावलके जलमें समान भागमें पिसा हुआ नीलकमल, शर्करा, मधु तथा रक्तकमलका योग रक्तविकारको शान्त करता है।

सोंठ, शर्करा और मधु मिलाकर बनायी गयी गुटिका खानेमात्रसे मनुष्यका स्वर कोयलके समान हो जाता है।

हरिताल, शंखचूर्ण, केलेके पत्तेका भस्म—इनका उबटन लगानेसे बाल गिर जाते हैं। लवण, हरिताल, लौकी और लाक्षारससे युक्त उबटन भी रोम गिरानेका उत्तम योग है। सुधा, हरिताल, शंखभस्म तथा मैनसिलको सेंधा नमक एवं बकरेके मूत्रमें मिलाकर पीसकर और उसी क्षण उससे उबटन करनेसे रोम गिर जाते हैं। यह उत्तम औषधि है।

शंख, आँवलेकी पत्तियाँ और धातकीके पुष्पोंको दूधके साथ पीसकर उसे डेढ़ सप्ताहतक मुखमें रखनेसे दाँत चिकने, सफेद तथा स्वच्छ और कान्तिसे युक्त हो जाते हैं। (अध्याय १७८-१८१)


भोज्य पदार्थोंका विहित सेवनकाल, बल-बुद्धिवर्धक औषधियाँ तथा विषदोषशमनके उपाय

श्रीहरिने कहा—हे रुद्र! प्रायः शरद्, ग्रीष्म और वसन्त-ऋतुमें दहीका उपभोग निन्दनीय है तथा हेमन्त, शिशिर एवं वर्षा-ऋतुमें दही प्रशस्त होता है— | शरद्ग्रीष्मवसन्तेषु प्रायशो दधि गर्हितम्।<br>हेमन्ते शिशिरे चैव वर्षासु दधि शस्यते॥<br>(१८२। १)<br>भोजन करनेके पश्चात् नवनीत (मक्खन)-के