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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 236 of 634

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Page 236

२२६ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

नष्ट कर देती है)। नैमिषक्षेत्र, कुरुक्षेत्र, प्रभासक्षेत्र, कालिन्दी (यमुना), गङ्गा तथा सभी तीर्थ भी एकादशीके समान नहीं हैं। कोई भी दान, जप, होम या अन्य पुण्य इसके तुल्य नहीं है। यदि एक ओर पृथिवीके दानका सत्कर्म रखकर दूसरी ओर भगवान् हरिकी इस पवित्र एकादशी तिथिकी तुलना की जाय तो भी यही एक महापुण्यशालिनी एकादशी तिथि सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होगी।

इस व्रतमें भगवान् वराहदेवकी स्वर्णप्रतिमा बनाकर नये ताम्रपात्रमें घटके ऊपर स्थापित करना चाहिये। तदनन्तर ब्राह्मणजन समस्त विश्वके बीजभूत विष्णुदेवकी उस प्रतिमाको श्वेत वस्त्रसे आच्छादितकर स्वर्णनिर्मित दीपादिक उपचारोंसे प्रयत्नपूर्वक उनकी पूजा करे।

'ॐ वराहाय नमः' इस मन्त्रसे उन विष्णुके चरणकमलोंकी पूजाकर 'ॐ क्रोडाकृतये नमः' इस मन्त्रसे उनके कटिप्रदेशका पूजन करे। तदनन्तर 'ॐ गम्भीरघोषाय नमः' इस मन्त्रसे उनकी नाभिकी पूजा कर 'ॐ श्रीवत्सधारिणे नमः' इस मन्त्रसे उनके वक्षःस्थलका पूजन करे। उसके बाद 'ॐ सहस्रशिरसे नमः' इस मन्त्रसे उन विष्णुभगवान्‌की भुजाओंकी पूजा करके भक्तको 'ॐ सर्वेश्वराय नमः' इस मन्त्रसे उन देवके ग्रीवाभागकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर व्रती 'ॐ सर्वात्मने नमः' इस मन्त्रसे मुखकी और 'ॐ प्रभवाय नमः' इस मन्त्रसे हरिके ललाटभागकी पूजाकर 'ॐ शतमयूखाय नमः' इस मन्त्रसे उन चक्रधारी हरिकी केशराशिकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये।

इस प्रकार भगवान् विष्णुकी विधिपूर्वक पूजाको समाप्तकर व्रती रात्रिमें जागरण करते हुए भगवान् हरिके माहात्म्यको प्रतिपादित करनेवाले पुराणकी कथाका श्रवण करे। तदनन्तर प्रातःकाल स्वर्णनिर्मित वराह-सहित सपरिवार भगवान्‌की उस मूर्तिको अपेक्षा रखनेवाले ब्राह्मणको दे करके पारणा करे।

इस विधि-विधानसे व्रत करनेसे मनुष्य पुनः माताके गर्भसे उत्पन्न होकर स्तनका दूध नहीं पान करता है अर्थात् वह पुनर्जन्मसे मुक्त हो जाता है। इस पुण्यशालिनी एकादशीका व्रत करनेसे प्राणीको पितृ, गुरु एवं देव—इन तीनों ऋणोंसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है। यह व्रत सभी व्रतोंका आदि स्थान है। इस व्रतको करके मनुष्य अपने समस्त मनोवाञ्छित फलोंको प्राप्त करनेमें सफल रहता है।

(अध्याय १२७)


व्रतपरिभाषा तथा व्रतमें पालन करनेयोग्य नियम और अन्य ज्ञातव्य बातें

ब्रह्माजीने कहा— हे व्यास! जिन व्रतोंको करनेसे नारायण संतुष्ट होकर सब कुछ प्रदान करते हैं, उन व्रतोंको मैं कहूँगा। शास्त्रके द्वारा वर्णित नियम-पालन व्रत कहलाता है और वही तप है। व्रतीके कुछ सामान्य नियम इस प्रकार हैं—

व्रतीको नित्य तीनों संध्याओंमें स्नान करना चाहिये। उसे जितेन्द्रिय होकर भूमिपर शयन करना चाहिये। स्त्री, शूद्र और पतितजनोंके साथ बातचीत करना उसके लिये वर्जित है। वह पवित्र बना रहे और प्रतिदिन हवन करे।

सुकृत करनेवाले मनुष्यको चाहिये कि वह नियमोंका पालन करे। (व्रताचरणके पूर्व) क्षौर न कराना चाहे तो दुगुना व्रत करना चाहिये।

व्रतीके लिये कांस्यपात्र, उड़द, मसूर, चना,