Skip to content
SarvaKosh
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished634 pages

Page 237 of 634

Read in context
Page 237

काण्ड ] प्रतिपदा, तृतीया, चतुर्थी तथा पञ्चमीमें किये जानेवाले विविध तिथिव्रत २२७

कोदो, दूसरेका अन्न, शाक और मधुका सेवन वर्जित है। पुष्प, अलंकार, नवीन वस्त्र, धूप-गन्धादि लेप, दन्तधावन और अञ्जनका प्रयोग त्याज्य है। पञ्चगव्य पान कर व्रतका आचरण करना चाहिये। एकसे अधिक बार जलपान, ताम्बूल-भक्षण, दिनमें शयन तथा मैथुन करनेसे व्रतभंग हो जाता है।

क्षमा, सत्य, दया, दान, शौच, इन्द्रियनिग्रह, देवपूजा, अग्निमें हवन, संतोष और चोरी न करना—ये दस सभी व्रतोंके सामान्य धर्म हैं।

क्षमा सत्यं दया दानं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ॥
देवपूजाग्निहवने संतोषोऽस्तेयमेव च।
सर्वव्रतेष्वयं धर्मः सामान्यो दशधा स्मृतः ॥
(१२८। ८-९)

(चौबीस घण्टेमें केवल एक बार) नक्षत्रदर्शनके समय किया जानेवाला भोजन नक्तव्रत कहा जाता है और जो रात्रिमें भोजन किया जाता है, वह नक्तव्रत नहीं है। एक पल गोमूत्र, आधे अँगूठेके बराबर गोमय, सात पल गोदुग्ध, तीन पल गोधधि, एक पल गोघृत और एक पल कुशोदक—यह पञ्चगव्यका परिमाण है। गायत्रीमन्त्रसे गोमूत्र, 'गन्धद्वारा०' इस मन्त्रसे गोमय, 'आप्यायस्व०' मन्त्रसे दूध, 'दधि०' मन्त्रसे दही, 'तेजोऽसि०' मन्त्रसे घृत और 'देवस्य०' इस मन्त्रसे कुशोदकको अभिमन्त्रितकर पञ्चगव्यका निर्माण करना चाहिये।

अग्न्याधान, प्रतिष्ठा, यज्ञ, दान, व्रत, वेदव्रत, वृषोत्सर्ग, चूडाकरण, उपनयन, विवाहादिक माङ्गलिक कृत्य और राज्याभिषेक आदि कर्म मलमासमें नहीं करना चाहिये।

अमावास्यासे अमावास्यातक चान्द्रमास होता है। सूर्योदयसे लेकर दूसरे सूर्योदयतक एक दिन, इस प्रकार तीस दिनका सावनमास होता है। एक राशिसे दूसरे राशिपर सूर्यके संक्रमणकालको सौरमास कहते हैं। नक्षत्र सत्ताईस होते हैं। उनके अनुरोधसे जो मास होता है, उसे नाक्षत्रमास कहते हैं। विवाहकार्यमें सौरमास, यज्ञादिमें सावनमास ग्रहण किया जाता है।

द्वितीयाके साथ तृतीया, चतुर्थीके साथ पञ्चमी, षष्ठीके साथ सप्तमी, अष्टमीके साथ नवमी, एकादशीके साथ द्वादशी, चतुर्दशीके साथ पूर्णिमा तथा प्रतिपदाके साथ अमावास्याका युग्म हो तो ऐसी युग्म-तिथि महाफलदायक होती है। इसके विपरीत यदि युग्म-तिथियाँ हों तो वह महाघोर काल है। वह पूर्वजन्मके किये हुए पुण्यको भी नष्ट कर देता है।

यदि व्रत प्रारम्भ करनेके पश्चात् व्रतकालमें ही स्त्रियोंमें रजोदर्शन हो जाता है तो उससे उनका व्रत नष्ट नहीं होता है। ऐसी स्थितिमें उन्हें चाहिये कि वे दान-पूजा आदि कार्य किसी अन्यसे सम्पन्न करायें और स्नान, उपवासादि कायिक कार्य स्वयं करें।

यदि क्रोध, प्रमाद अथवा लोभवश किसीका व्रत भंग हो जाता है तो उसको तीन दिनतक उपवास करके शिरोमुण्डन करा देना चाहिये। शरीरके असमर्थ हो जानेपर व्रतीको अपने पुत्रादिसे व्रत कराना चाहिये। यदि व्रतकालमें व्रती मूर्च्छित हो जाता है तो उसे जल आदि पिला देना चाहिये। इससे व्रतभंग नहीं होता। (अध्याय १२८)


प्रतिपदा, तृतीया, चतुर्थी तथा पञ्चमीमें किये जानेवाले विविध तिथिव्रत

**ब्रह्माजीने कहा—**हे व्यास! अब मैं प्रतिपदादि तिथियोंके व्रतोंकी विधियोंका वर्णन करूँगा। आप उनका श्रवण करें। प्रतिपदा तिथिके एक विशेष व्रतका नाम शिखिव्रत है। इस व्रतको करनेसे व्रती वैश्वानर-पद प्राप्त करता है। प्रतिपदा तिथिमें एकभक्तव्रत करके दिनमें एक बार भोजन करना चाहिये। व्रतकी समाप्तिपर कपिला गौका दान करे। चैत्रमासके प्रारम्भमें विधिपूर्वक सुन्दर