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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

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Page 235

काण्ड ] भीमा-एकादशीव्रत एवं माहात्म्य तथा पूजन-विधि २२५

विष्णुमण्डल-पूजाविधि

ब्रह्माजीने कहा—जिस पूजाको करनेसे लोग परमगतिको प्राप्त हो गये हैं, मैं उसी भुक्ति एवं मुक्ति देनेमें समर्थ श्रेष्ठ पूजाका विधिवत् वर्णन करूँगा।

व्रतीको सर्वप्रथम एक सामान्य पूजामण्डलका निर्माण कर द्वारदेशसे उसमें पूजा प्रारम्भ करनी चाहिये। मण्डलके द्वारदेशमें धाता, विधाता और महानदी गङ्गा, यमुनाकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर द्वारदेशपर ही श्री, दण्ड, प्रचण्ड और वास्तुपुरुषकी पूजाकर मध्यभागमें आधारशक्ति, कूर्मदेव एवं अनन्तका पूजन करे। इसके बाद पूजक पृथिवी, धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनैश्वर्यकी पूजा कन्द, नाल, पद्म, कर्णिका तथा केसरादि भागोंपर करे। तदनन्तर सत्त्व, रजस् और तमस् गुणोंकी पूजा करके उस व्रतीको यथाविहित स्थानपर सूर्यादि ग्रहमण्डलोंकी और विमलादि शक्तियोंकी भी पूजा करनी चाहिये।

इसके बाद मण्डलके कोणभागमें दुर्गा, गणेश, सरस्वती और क्षेत्रपाल देवोंकी तथा आसन और मूर्तिकी पूजा कर व्रती भगवान् वासुदेव और बलभद्रका स्मरण करता हुआ महात्मा अनिरुद्ध तथा नारायणकी पूजा करे। वह उनके हृदयादि सम्पूर्ण अङ्ग, शंख, चक्र तथा गदादि आयुधकी पूजाकर श्री, पुष्टि, गरुड, गुरु और परम गुरुकी पूजा करे। तदनन्तर उसे इन्द्रादि आठों दिक्पालकी पूजा उनकी ही दिशाओंमें करके अधोभागमें नाग तथा ऊर्ध्वभागमें ब्रह्माकी पूजा करनी चाहिये। आगमशास्त्रमें निर्दिष्ट विधिके अनुसार विष्वक्सेन देवकी पूजा ईशानकोणमें करके उस मण्डलकी पूजाको पूर्ण करना चाहिये।

जो मनुष्य इस विधिके अनुसार एक बार भी भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, उस महात्माका पुनर्जन्म इस संसारमें नहीं होता। पुण्डरीकाक्ष गदाधर भगवान् विष्णु एवं ब्रह्माकी पूजा करनेसे पुनः जन्म नहीं होता। (अध्याय १२६)


भीमा-एकादशीव्रत एवं माहात्म्य तथा पूजन-विधि

ब्रह्माजीने कहा—प्राचीनकालमें माघमासके शुक्लपक्षमें हस्तनक्षत्रसे युक्त एक एकादशीका व्रत भीमने किया था। इसलिये इस एकादशीको भीमा-एकादशी कहा जाता है। यह आश्चर्य है कि मात्र इसी एकादशीका व्रत करनेसे भीमसेन पितृऋणसे मुक्त हो गये थे।

प्राणियोंके पुण्योंकी अभिवृद्धि करनेवाली भीमा-द्वादशी तिथि भीमसेनके नामसे ही प्रसिद्ध भी है। यह तिथि तो बिना हस्तनक्षत्रके संयोगसे ही ब्रह्महत्यादि पापोंका विनाश कर देती है।

यह द्वादशी तिथि महापापोंको तो वैसे ही नष्ट कर देती है, जैसे कुमार्गगामी राजासे राज्य, कुपुत्रसे कुल, दुष्टपत्नीसे पति, अधर्मसे धर्म, कुमन्त्रीसे राजा, अज्ञानसे ज्ञान, अशौचसे शौच, अश्रद्धासे श्राद्ध, असत्यसे सत्य, उष्णतासे शीतलता, अनाचारसे सम्पत्ति, कहनेमात्रसे दान, विस्मय करनेसे तप, अशिक्षासे पुत्र, दूर चली जानेसे गौ, क्रोधसे शान्ति, नहीं बढ़ानेसे धन, ज्ञानसे अविद्या और निष्कामतासे फल विनष्ट हो जाते हैं। उसी प्रकार पापनाशके लिये द्वादशी तिथि शुभ कही गयी है।

ब्रह्महत्या, सुरापान, सुवर्ण-चोरी तथा गुरुपत्नी-गमन—ये महापातक मनुष्यमें यदि एक साथ उत्पन्न हो जायें तो इनको त्रिपुष्कर तीर्थ भी नष्ट नहीं कर सकते हैं (किंतु यह द्वादशी उस समस्त पापसमूहको