धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ एवं धनुर्वेद मंगलाचरण
धनुर्वेदसंहिता
खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन
बम्बई
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श्रीमद्वसिष्ठमहर्षिप्रणीता
धनुर्वेदसंहिता
पं० हरदयालु स्वामिविरचितहिन्दीटीकासमेता
खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन,
बम्बई
संस्करण-सन् १९९०, संवत् २०४७
मूल्य १५ रुपये मात्र
सर्वाधिकार
प्रकाशक द्वारा सुरक्षित
मुद्रक और प्रकाशक-
मे० खेमराज श्रीकृष्णदास, अध्यक्ष-श्रीवेंकटेश्वर प्रेस, बम्बई-४, के लिये
दे० स० शर्मा, मेनेजर, द्वारा श्रीवेंकटेश्वर प्रेस, खेतवाड़ी, बम्बई-४ में मुद्रित।
भूमिका
समर्पण कर दिया।
पाठकगण! यह ‘वासिष्ठी धनुर्वेदसंहिता’ मूलमात्र मुझको
इलाका जयपुर के सनथला बनथली कोढ़ा के मोलकराम
ब्राह्मण के पास से लिखने को संवत् १९३३ में चुरू रामगढ़ में
मिली जब से यह धरी थी। अब एक प्रति खड्गविलासयंत्रालय
की छपी हुई देखने में आई तथा १ पुस्तक अलीगढ़ के जिले में
छपी। इसको देखकर हमने भी अपनी पुस्तक पण्डित
ईश्वरीप्रसादजी पाण्डे को दिखाई। इनकी आज्ञानुसार इसकी
भाषा अति परिश्रम करके बनाई। परिश्रम का फल यथाशक्ति
पण्डितजी से पाया। अब इस पुस्तक का सर्वाधिकार श्रीमान्
खेमराज श्रीकृष्णदास “श्रीवेङ्कटेश्वर” (स्टीम्) यन्त्रालयाधिप
को समर्पण कर दिया।
पण्डित हरदयालु स्वामी,
ग्राम कंबाली निवासी रिवाडी-गुडगांव.
धनुर्वेदसंहितास्थविषानुक्रमणिका
विषय पृष्ठांक | विषय पृष्ठांक
विश्वामित्रजी का वसिष्ठजी से | दूरपात २६
धनुर्विद्या माँगना १ | दृढ़भेद २६
धनुर्वेद का अधिकार २ | हीनगति २७
धनुर्दानविधिः ३ | शुद्धगति २८
आचार्यलक्षण ३ | दृढ़चतुष्क २९
वेधविधिः ५ | चित्रविधि ३०
चापप्रमाण ७ | काष्ठछेदन ३१
शुभचापलक्षणम् ८ | धावल्लक्ष्य ३१
निषिद्ध धनु ८ | उसकी विधि ३२
गणलक्षण १० | शब्दवेधित्व ३२
बाणलक्षण ११ | प्रत्यागमन ३३
फललक्षण १३ | अस्त्रविधि ३३
बाणों के कर्म १३ | औषधि ३८
बाणों के स्वरूप १४ | संग्रामविधि ४०
बाण पायन १५ | स्वरबलयुद्धम् ४१
नाराचनालीकतशघ्नी वर्णन १६ | राहुयोगिनी ४४
स्थानमुष्टाकर्षणलक्षण १६ | व्यूहाः ४५
गुणमुष्टि १८ | व्यूहों के आकार ४८
धनुर्मुष्टिसंधान १९ | सेनानय ५६
व्याय १९ | धातुपाठ ६०
अथ लक्ष्यम् २० | धावनकर ६०
श्रमक्रिया २१ | पदातिक्रम ६१
शूरप्रमाण २२ | उदाहरणम् ६२
नाराचप्रमाण २२ | अथाश्वक्रम ६३
अनध्याय २२ | अथहस्तिक्रम ६४
श्रमक्रिया २४ | रथक्रम ६५
लक्ष्यास्खलन २५ | शिक्षा ६५
शीघ्र संधान २६ | हन्तव्याऽहन्तव्योपदेश ६६
इत्यनुक्रमणिका समाप्ता
ॐ साम्बसदाशिवाय नमः
अथ वासिष्ठीधनुर्वेदसंहिताप्रारम्भः
अथैकदा विजिगीषुुर्विश्वामित्रो राजर्षिर्गुरुं वसिष्ठमभ्यु-
पेत्य प्रणम्योवाच ब्रूहि भगवन् धनुर्विद्यां श्रोत्रियाय
दृढचेतसे शिष्याय दुष्टशत्रुविनाशाय च । तमुवाच
महर्षिर्ब्रह्मर्षिप्रवरो वसिष्ठः शृणु भो राजन्विश्वामित्र
यां सरहस्यधनुर्विद्यां भगवान्सदाशिवः परशुरामायो-
वाच तामेव सरहस्यां वच्मि ते हिताय गोब्राह्मणसाधु-
वेदरक्षणाय च यजुर्वेदाथर्वसम्मितां संहिताम् ॥
एक समय विजय के आकांक्षी राजर्षि विश्वामित्र वसिष्ठ गुरुजी के पास
जाकर प्रणाम कर बोले, हे भगवन्! श्रोत्रिय, दृढ़चित्त, मुझशिष्य को
दुष्ट स्वभाव वाले शत्रुओं का नाश करने के लिए धनुर्विद्या कहिए।
महर्षिब्रह्मऋषियों में श्रेष्ठ वसिष्ठजी बोले कि हे राजन् विश्वामित्र!
सुनिए, जिस सरहस्य धनुर्वेदविद्या को भगवान् महादेवजी ने परशुराम-
जी को कहा था। उसी यजुर्वेद और अथर्ववेद से मिली हुई रहस्य सहित
धनुर्विद्या को मैं आपसे गौ, ब्राह्मण, वेद और साधुओं की रक्षा के लिये
कहता हूँ॥
अथोवाच महादेवो भार्गवाय च धीमते ।
तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि याथातथ्येन संशृणु ॥१॥
महादेवजी ने बुद्धिमान् परशुरामजी से जो कहा था। ठीक वही मैं
आपसे कहता हूँ, सुनिये॥१॥
२
२ धनुर्वेदसंहिता
तत्र चतुष्टयपादात्मको धनुर्वेदः यस्य प्रथमे पादे दीक्षा-
प्रकारः । द्वितीये संग्रहः । तृतीये सिद्धप्रयोगाः । चतुर्थे
प्रयोगविधयः ॥२॥
महादेवजी के कहे हुए धनुर्वेद में चार पाद हैं। पहिले पाद में धनुर्वेद की
दीक्षा (उपदेश) की विधि है। दूसरे पाद में अभ्यास करने की विधि है।
तीसरे में प्रक्षेपणादि प्रकार हैं। चौथे पाद में अस्त्रसंधानादि प्रयोग विधि
हैं॥२॥
अथ कस्य धनुर्वेदाधिकारः इत्यपेक्षायामाह
धनुर्वेदगुरुर्विप्रः प्रोक्तो वर्णद्वयस्य च ।
युद्धाधिकारः शूद्रस्य स्वयं व्यापादिशिक्षया ॥३॥
धनुर्वेद सिखाने में ब्राह्मण तो गुरु होता है और धनुर्वेद से युद्ध का
अधिकार दो ही वर्णों के लिये कहा है, शूद्र को तो अपने आप ही
शिकार आदि करने का अधिकार है॥३॥
चतुर्विधमायुधम् । मुक्तममुक्तं मुक्तामुक्तं यन्त्रमुक्तं
चेति ॥४॥
मुक्त अर्थात् चक्र आदि जो हाथ से छोड़े जायँ उनको अस्त्र कहते हैं।
अमुक्त खड्ग आदि। मुक्ताऽमुक्त बरछी आदि। यन्त्रमुक्त शर, गोली
आदि। ये चार प्रकार के आयुध कहलाते हैं॥४॥
दुष्टदस्युचौरादिभ्यः साधुसंरक्षणं धर्मतः ।
प्रजापालनं धनुर्वेदस्य प्रयोजनम् ॥५॥
बुरे मनुष्य डाकू चोर आदिकों से श्रेष्ठों की रक्षा करना, धर्म से प्रजा
का पालन करना, यही धनुर्वेद का प्रयोजन है॥५॥
एकोऽपि यत्र नगरे प्रसिद्धः स्याद्धनुर्धरः ।
ततो यान्त्यरयो दूरान्मृगाः सिंहगृहादिव ॥६॥
जिस नगर में एक भी प्रसिद्ध धनुर्धारी हो उस नगर से शत्रु दूर ही चले
जाते हैं जैसे सिंह के घर से अरण्य पशु दूर चले जाते हैं॥६॥
हिन्दीटीकासमेता ३
अथ धनुर्दानविधिः
आचार्येण धनुर्देयं ब्राह्मणे सुपरीक्षिते ।
लुब्धे धूर्ते कृतघ्ने च मन्दबुद्धौ न दापयेत् ॥७॥
धनुर्विद्या देने की विधि यह है कि, आचार्य को चाहिये कि अच्छी
परीक्षा किये हुए ब्राह्मण को धनुर्विद्या दें। लोभी और धूर्त, जो दी हुई
विद्या का अहसान न माने ऐसे पुरुष को तथा मन्दबुद्धि को धनुर्विद्या न
दे॥७॥
ब्राह्मणाय धनुर्देयं खड्गं वै क्षत्त्रियाय च ।
वैश्याय दापयेत्कुन्तं गदां शूद्राय दापयेत् ॥८॥
ब्राह्मण को धनुष दे, क्षत्रिय को तलवार, वैश्य को भाला और शूद्र को
गदायुद्ध सिखावे॥८॥
धनुश्चक्रं च कुन्तं च खड्गं च क्षुरिका गदा ।
सप्तमं बाहुयुद्धं स्यादेवं युद्धानि सप्तधा ॥९॥
धनुष १ चक्र २ भाला ३ खड्ग ४ छुरी ५ गदा ६ सातवां हाथों से मल्ल
युद्ध इस प्रकार से सात प्रकार का युद्ध है॥९॥
अथाचार्यलक्षणम्
आचार्यः सप्तयुद्धः स्याच्चतुर्भिर्भार्गवः स्मृतः ।
द्वाभ्यां चैव भवेद्योद्धा एकेन गणको भवेत् ॥१०॥
अब आचार्य के लक्षण कहते हैं। जो सातों प्रकारके युद्ध जानता है वह
आचार्य होता है। जो चार प्रकारके युद्ध जाने, वह भार्गव कहलाता है।
दो प्रकारके युद्ध को जानने वाला योद्धा होता है, और एक प्रकारके युद्ध
से गणकसंज्ञा वाला होता है॥१०॥
हस्तः पुनर्वसुः पुष्यो रोहिणी चोत्तरात्रयम् ।
अनुराधाश्विनी चैव रेवती दशमी तथा ॥११॥
धनुर्विद्या का मुहूर्त हस्त, पुनर्वसु, पुष्य, रोहिणी, और तीनों उत्तरा,
अनुराधा, अश्विनी और दशवीं रेवती॥११॥
जन्मस्थे च तृतीये च षष्ठे वै सप्तमे तथा ।
दशमैकादशे चन्द्रे सर्वकार्याणि कारयेत् ॥१२॥
४ धनुर्वेदसंहिता
प्रथम, तीसरे, छठे, सातवें, दशवें, ग्यारहवें चन्द्रमा में आचार्य धनुर्विद्या
के सारे काम करवावे॥१२॥
तृतीया पंचमी चैव सप्तमी दशमी तथा ।
त्रयोदशी द्वादशी च तिथयस्तु शुभा मताः ॥१३॥
तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, त्रयोदशी और द्वादशी ये तिथियां शुभ
हैं॥१३॥
रविवारः शुक्रवारो गुरुवारस्तथैव च ।
एतद्वारत्रयं धन्यं प्रारम्भे शस्त्रकर्मणाम् ॥१४॥
रवि, शुक्र, गुरु, शस्त्रों के प्रारम्भ कर्म में ये तीन वार सराहने योग्य
हैं॥१४॥
एभिर्दिनैस्तु शिष्याय गुरुः शस्त्राणि दापयेत् ।
संतर्प्य दानहोमाभ्यां सुरान्स्वाहाविधानतः ॥१५॥
गुरु इन दिनों में दान और होम करके देवताओं को तृप्त कर शिष्य को
शस्त्र दे॥१५॥
ब्राह्मणान्भोजयेत्तत्र कुमारीश्चाप्यनेकंशः ।
तापसानर्चयेद्भक्त्या ये चान्ये शिवयोगिनः ॥१६॥
वहां अनेक ब्राह्मण और कन्याओं को जिमावे और जो शिव के भक्त
योगी हों उनको भक्ति से अर्चन पूजन करै॥१६॥
अन्नपानादिभिश्चैव वस्त्रालङ्कारभूषणैः ।
गन्धमाल्यैर्विचित्रैश्च गुरुं तत्र प्रपूजयेत् ॥१७॥
पीछे गन्ध माला अन्नादि वस्त्र गहने आदि से गुरुजी का पूजन
करे॥१७॥
कृतोपवासः शिष्यस्तु धृताजिनपरिग्रहः ।
बद्धांजलिपुटस्तत्र याचयेद्गुरुतो धनुः ॥१८॥
उपवास किया हुआ शिष्य मृगचर्म धारण किये हुए हाथ जोड़कर गुरु से
धनुष की याचना करे॥१८॥
अङ्गन्यासस्ततः कार्यः शिवोक्तः सिद्धिमिच्छता ।
आचार्येण च शिष्यस्य पापघ्नो विघ्ननाशनः ॥१९॥