धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
पृष्ठ 8, कुल 76 में से
संदर्भ में पढ़ें२ धनुर्वेदसंहिता
तत्र चतुष्टयपादात्मको धनुर्वेदः यस्य प्रथमे पादे दीक्षा-
प्रकारः । द्वितीये संग्रहः । तृतीये सिद्धप्रयोगाः । चतुर्थे
प्रयोगविधयः ॥२॥
महादेवजी के कहे हुए धनुर्वेद में चार पाद हैं। पहिले पाद में धनुर्वेद की
दीक्षा (उपदेश) की विधि है। दूसरे पाद में अभ्यास करने की विधि है।
तीसरे में प्रक्षेपणादि प्रकार हैं। चौथे पाद में अस्त्रसंधानादि प्रयोग विधि
हैं॥२॥
अथ कस्य धनुर्वेदाधिकारः इत्यपेक्षायामाह
धनुर्वेदगुरुर्विप्रः प्रोक्तो वर्णद्वयस्य च ।
युद्धाधिकारः शूद्रस्य स्वयं व्यापादिशिक्षया ॥३॥
धनुर्वेद सिखाने में ब्राह्मण तो गुरु होता है और धनुर्वेद से युद्ध का
अधिकार दो ही वर्णों के लिये कहा है, शूद्र को तो अपने आप ही
शिकार आदि करने का अधिकार है॥३॥
चतुर्विधमायुधम् । मुक्तममुक्तं मुक्तामुक्तं यन्त्रमुक्तं
चेति ॥४॥
मुक्त अर्थात् चक्र आदि जो हाथ से छोड़े जायँ उनको अस्त्र कहते हैं।
अमुक्त खड्ग आदि। मुक्ताऽमुक्त बरछी आदि। यन्त्रमुक्त शर, गोली
आदि। ये चार प्रकार के आयुध कहलाते हैं॥४॥
दुष्टदस्युचौरादिभ्यः साधुसंरक्षणं धर्मतः ।
प्रजापालनं धनुर्वेदस्य प्रयोजनम् ॥५॥
बुरे मनुष्य डाकू चोर आदिकों से श्रेष्ठों की रक्षा करना, धर्म से प्रजा
का पालन करना, यही धनुर्वेद का प्रयोजन है॥५॥
एकोऽपि यत्र नगरे प्रसिद्धः स्याद्धनुर्धरः ।
ततो यान्त्यरयो दूरान्मृगाः सिंहगृहादिव ॥६॥
जिस नगर में एक भी प्रसिद्ध धनुर्धारी हो उस नगर से शत्रु दूर ही चले
जाते हैं जैसे सिंह के घर से अरण्य पशु दूर चले जाते हैं॥६॥