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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 812 of 889

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Page 812

अ० १७] षष्ठ स्कन्ध ८०३


लोभ एव मनुष्याणां देहसंस्थो महारिपुः।<br>सर्वदुःखाकरः प्रोक्तो दुःखदः प्राणनाशकः॥ ४६लोभ मनुष्योंके देहमें रहनेवाला सबसे बड़ा शत्रु है। यह समस्त दुःखोंका आगार, दुःखदायी तथा प्राणोंका नाश करनेवाला कहा गया है॥ ४६॥
सर्वपापस्य मूलं हि सर्वदा तृष्णायान्वितः।<br>विरोधकृत्त्रिवर्णानां सर्वार्तेः कारणं तथा॥ ४७यह लोभ सम्पूर्ण पापोंकी जड़ तथा सभी दुःखोंका कारण है। लोभसे युक्त प्राणी सदा तीनों वर्णोंके लोगोंसे विरोध रखनेवाला होता है॥ ४७॥
लोभात्त्यजन्ति धर्मं वै कुलधर्मं तथैव हि।<br>मातरं भ्रातरं हन्ति पितरं बान्धवं तथा॥ ४८लोभके वशीभूत प्राणी अपने सदाचार तथा कुल-धर्मका भी परित्याग कर देते हैं। वे अपने माता, पिता, भाई, बान्धव, गुरु, मित्र, पत्नी, पुत्र तथा बहनतकका वध कर देते हैं। इस प्रकार लोभके वशीभूत मनुष्य पापसे विमोहित होकर कौन-सा दुष्कर्म नहीं कर डालता॥ ४८-४९॥
गुरुं मित्रं तथा भार्यां पुत्रं च भगिनीं तथा।<br>लोभाविष्टो न किं कुर्यादकृत्यं पापमोहितः॥ ४९
क्रोधात्कामादहङ्कारालोभ एव महारिपुः।<br>प्राणांस्त्यजति लोभेन किं पुनः स्यादनावृतम्॥ ५०क्रोध, काम तथा अहंकारसे भी बढ़कर लोभ महान् शत्रु है। लोभमें पड़कर मनुष्य अपने प्राणतक गँवा देता है; फिर इसके विषयमें और क्या कहा जाय !॥ ५०॥
पूर्वजास्ते महाराज धर्मज्ञाः सत्पथे स्थिताः।<br>पाण्डवाः कौरवाश्चैव लोभेन निधनं गताः॥ ५१हे महाराज ! आपके पूर्वज धर्मज्ञ तथा सत्यपथपर चलनेवाले थे, किंतु वे पाण्डव तथा कौरव लोभके कारण ही मारे गये। जहाँ भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, बाह्रीक, भीमसेन, धर्मपुत्र युधिष्ठिर, अर्जुन तथा श्रीकृष्ण थे, फिर भी लोभके वशीभूत उन्होंने आपसमें भीषण युद्ध किया और अपने कुटुम्बका महाविनाश कर डाला। उस युद्धमें द्रोण, भीष्म, पाण्डवोंके पुत्र, भाई, पिता, पुत्र सभी मारे गये॥ ५१-५४॥
यत्र भीष्मश्च द्रोणश्च कृपः कर्णश्च बाह्लिकः।<br>भीमसेनो धर्मपुत्रस्तथैवार्जुनकेशवौ॥ ५२
तथापि युद्धमत्युग्रं कृतं तैश्च परस्परम्।<br>कुटुम्बकदनं भूरि कृतं लोभात्तैरैरिह॥ ५३
हतो द्रोणो हतो भीष्मस्तथैव पाण्डवात्मजाः।<br>भ्रातरः पितरः पुत्राः सर्वे वै निहता रणे॥ ५४
तस्माल्लोभाभिभूतस्तु किं न कुर्यान्नरः किल।<br>हैहयैर्निहताः सर्वे भृगवः पापबुद्धिभिः॥ ५५अतएव लोभपरायण मनुष्य क्या नहीं कर डालता? [लोभके कारण ही] पापबुद्धि हैहयवंशी क्षत्रियोंने भृगुकुलके समस्त ब्राह्मणोंको मार डाला था॥ ५५॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे हैहयैर्धनाहरणेन सह भृगूणां वधवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः॥ १६॥


अथ सप्तदशोऽध्यायः

भगवतीकी कृपासे भार्गव-ब्राह्मणीकी जंघासे तेजस्वी बालककी उत्पत्ति, हैहयवंशी क्षत्रियोंकी उत्पत्तिकी कथा

जनमेजय उवाच<br>कथं ताश्च स्त्रियः सर्वा भृगूणां दुःखसागरात्।<br>मुक्ता वंशः पुनस्तेषां ब्राह्मणानां स्थिरोऽभवत्॥ १जनमेजय बोले— भृगुवंशकी स्त्रियोंका पुनः दुःखरूप समुद्रसे कैसे उद्धार हुआ और उन ब्राह्मणोंकी वंशपरम्परा किस प्रकार स्थिर रही?॥ १॥
हैहयैः किं कृतं कार्यं हत्वा तान्ब्राह्मणानपि।<br>क्षत्रियैर्लोभसंयुक्तैः पापाचारैर्वदस्व तत्॥ २लोभके वशीभूत तथा पापाचारी हैहय क्षत्रियोंने उन ब्राह्मणोंको मारनेके पश्चात् कौन-सा कार्य किया? उसे आप बताइये॥ २॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—26 C