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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 811 of 889

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Page 811
८०२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १६
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
न ददुः प्रार्थितं विप्राः पादवृद्ध्यापि याचिताः।<br>नास्तीतिवादिनः स्तब्धाः दुःखितान्वीक्ष्य याज्यकान्॥ ३४यहाँतक कि चतुर्थांशवृद्धिपर भी धन माँगनेपर हम याचकोंको अत्यन्त दुःखित देखकर इन निष्ठुर ब्राह्मणोंने ‘हमारे पास नहीं है’—ऐसा कहा॥ ३३-३४॥
धनं प्राप्तं कार्तवीर्याद्रक्षितं केन हेतुना।<br>न कृताः क्रतवः किं तैर्दानं चार्थिषु भूरिशः॥ ३५महाराज कार्तवीर्यसे धन प्राप्त करके इन्होंने किस प्रयोजनसे धनकी रक्षा की? इन्होंने न तो यज्ञ किये और न तो याचकोंको ही प्रचुर दान दिया॥ ३५॥
न सञ्चितव्यं विप्रैस्तु धनं क्वापि कदाचन।<br>यष्टव्यं विधिवद्धेयं भोक्तव्यं च यथासुखम्॥ ३६ब्राह्मणोंको कभी भी धनका संग्रह नहीं करना चाहिये। यज्ञ करने, दान देने तथा सुखोपभोगमें यथेच्छ धनका उपयोग करना चाहिये॥ ३६॥
द्रव्ये चौरभयं प्रोक्तं तथा राजभयं द्विजाः।<br>वह्नेर्भयं महाघोरं तथा धूर्तभयं महत्॥ ३७हे विप्रो! पासमें धन रहनेपर चोर, राजा, अग्नि तथा धूर्तोंसे महान् भय कहा गया है॥ ३७॥
येन केनाप्युपायेन धनं त्यजति रक्षकम्।<br>अथवासौ मृतो याति द्रव्यं त्यक्त्वा ह्यसद्गतिम्॥ ३८जिस किसी भी उपायसे अपनी ही रक्षा करनेवालेको धन छोड़ देता है अथवा वह व्यक्ति धन छोड़कर स्वयं मर जाता है और दुर्गतिको प्राप्त होता है॥ ३८॥
पादवृद्ध्या तथास्माभिः प्रार्थितं विनयान्वितैः।<br>तथापि लोभसन्दिग्धैर्न दत्तं नः पुरोहितैः॥ ३९हम सबने बड़ी विनम्रताके साथ इन लोगोंसे चतुर्थांशवृद्धिपर धन माँगा था, फिर भी लोभके कारण संशयमें पड़े हुए पुरोहितोंने हमें धन नहीं दिया॥ ३९॥
दानं भोगस्तथा नाशो धनस्य गतिरीदृशी।<br>दानभोगौ कृतीनां च नाशः पापात्मनां किल॥ ४०दान, भोग तथा नाश—धनकी इस प्रकारकी गति होती है। पुण्यशाली प्राणियोंके धनकी गति दान तथा भोग है और दुष्ट आत्मावाले प्राणियोंके धनकी गति नाश है।
न दाता न च यो भोक्ता कृपणो गुप्तितत्परः।<br>राज्ञासौ सर्वथा दण्ड्यो वञ्चको दुःखभाङ्नरः॥ ४१जो कृपण व्यक्ति न दान करता है और न धनका उपभोग करता है, अपितु केवल धनके संग्रहमें लगा रहता है, वह वंचक प्राणी राजाके द्वारा सर्वथा दण्डनीय है और दुःखका भागी होता है॥ ४०-४१॥
तस्माद्वयं गुरूनेतान्वञ्चकान्ब्राह्मणाधमान्।<br>हन्तुं समुद्यताः सर्वे न क्रोधव्यं महात्मभिः॥ ४२इसीलिये इन वंचक गुरुओं तथा अधम ब्राह्मणोंको मारनेके लिये हम सभी उद्यत हुए हैं। आप महात्माजन इसके लिये हमपर कोप न करें॥ ४२॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा हेतुमद्वाक्यं तानाश्वास्य मुनीनथ।<br>विचेरुश्च विचिन्वाना भृगुदाराननेकशः॥ ४३व्यासजी बोले— इस प्रकार सहेतुक वचन कहकर उन मुनियोंको पूर्ण आश्वस्त करनेके बाद वे पुनः भृगुकुलकी स्त्रियोंको खोजते हुए भ्रमण करने लगे॥ ४३॥
भयार्ता भृगुपत्न्यस्तु हिमवन्तं धराधरम्।<br>प्रपेदिरे रुदन्त्यश्च वेपमानाः कृशा भृशम्॥ ४४भयार्त तथा अत्यन्त कृश शरीरवाली भृगुवंशीय पत्नियाँ हिमवान् पर्वतपर रोती तथा काँपती हुई पहुँचीं॥ ४४॥
एवं ते हैहयैर्विप्राः पीडिता धनकामुकैः।<br>निहताश्च यथाकामं संरब्धैः पापकर्मभिः॥ ४५इस प्रकार धनलोलुप तथा पापकर्मोंसे अभिभूत हैहयोंने उन ब्राह्मणोंको बहुत पीड़ित किया तथा उनका संहार किया॥ ४५॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—26 B