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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 813 of 889

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Page 813
८०४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १७
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
न तृप्तिरस्ति मे ब्रह्मन् पिबतस्ते कथामृतम् ।<br>पावनं सुखदं नृणां परलोके फलप्रदम् ॥ ३हे ब्रह्मन्! आपके द्वारा कथित इस पवित्र, लोगोंके लिये सुखदायक तथा परलोकमें फल देनेवाले कथामृतका पान करते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ ३ ॥
व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम् ।<br>यथा स्त्रियस्तु ता मुक्ता दुःखात्तस्माद्दुरत्ययात् ॥ ४व्यासजी बोले— हे राजन्! सुनिये, वे स्त्रियाँ उस भयावह दुःखसे जिस प्रकार मुक्त हुई, अब मैं उस पापनाशिनी कथाका वर्णन करूँगा ॥ ४ ॥
भृगुपत्न्यो यदा राजन् हिमवन्तं गिरिं गताः ।<br>भयत्रस्ता विभग्नाशा हैहयैः पीडिता भृशम् ॥ ५हे राजन्! जब क्षत्रिय हैहय भृगुकुलकी नारियोंको बहुत पीड़ित करने लगे तब वे भयभीत तथा निराश होकर हिमालयपर्वतपर चली गयीं ॥ ५ ॥
गौरीं तत्र तु संस्थाप्य मृण्मयीं सरितस्तटे ।<br>उपोषणपराश्चक्रुर्निश्चयं मरणं प्रति ॥ ६उन्होंने वहाँ नदीके तटपर गौरीकी मृण्मयी प्रतिमा स्थापित करके निराहार रहते हुए [उपासनामें लीन होकर] अपने मरणके प्रति पूरा निश्चय कर लिया ॥ ६ ॥
स्वप्ने गत्वा तदा देवी प्राह ताः प्रमदोत्तमाः ।<br>युष्मासु मध्ये कस्याश्चिद्भविता चोरुजः पुमान् ॥ ७<br>मदंशशक्तिसम्भिन्नः स वः कार्यं विधास्यति ।<br>इत्यादिश्य पराम्बा सा पश्चादन्तर्हिताभवत् ॥ ८एक समय स्वप्नमें भगवती जगदम्बाने उन उत्तम स्त्रियोंके पास पहुँचकर कहा—तुमलोगोंमेंसे किसीकी जंघासे एक पुरुष उत्पन्न होगा। मेरा अंशभूत वही शक्तिमान् पुरुष तुमलोगोंका कार्य सिद्ध करेगा। ऐसा कहकर पराम्बा भगवती अन्तर्धान हो गयीं ॥ ७-८ ॥
जागृतास्तु ततः सर्वा मुदमापुर्वराङ्गनाः ।<br>काचित्तासां भयोद्विग्ना कामिनी चतुरा भृशम् ॥ ९<br>दधार चोरुणैकेन गर्भं सा कुलवृद्धये ।जागनेपर वे सभी स्त्रियाँ बहुत प्रसन्न हुईं। उनमेंसे किसी चतुर, कामिनी स्त्रीने जो भयसे त्रस्त थी; वंशवृद्धिकेहेतु अपनी एक जंघामें गर्भ धारण किया ॥ ९ १/२ ॥
पलायनपरा दृष्टा क्षत्रियैर्ब्राह्मणी यदा ॥ १०<br>विह्वला तेजसा युक्ता तदा ते दुद्रुवुर्भृशम् ।जब उन हैहय क्षत्रियोंने व्याकुल तथा तेजयुक्त उस स्त्रीको भागती हुई देखा तब वे उसके पीछे दौड़ पड़े ॥ १० १/२ ॥
गृह्यतां वध्यतां नारी सगर्भा याति सत्वरा ॥ ११<br>इति ब्रुवन्तः सम्प्राप्ताः कामिनीं खड्गपाणयः ।'यह गर्भ धारण करके वेगपूर्वक भागी जा रही है, इसे पकड़ लो और मार डालो'—इस प्रकार कहते हुए हाथमें तलवार लेकर वे उस स्त्रीके पास पहुँच गये ॥ ११ १/२ ॥
सा भयार्ता तु तान्दृष्ट्वा रुरोद समुपागतान् ॥ १२<br>गर्भस्य रक्षणार्थं सा चुक्रोशातिभयातुरा ।भयसे घबरायी हुई वह स्त्री अपने समीप आये हुए उन क्षत्रियोंको देखकर रोने लगी और पुनः गर्भरक्षाके लिये भयसे विह्वल होकर जोर-जोरसे विलाप करने लगी ॥ १२ १/२ ॥
रुदतीं मातरं श्रुत्वा दीनां प्राणविवर्जिताम् ॥ १३<br>निराधारां क्रन्दमानां क्षत्रियैर्भृशतापिताम् ।<br>गृहीतामिव सिंहेन सगर्भां हरिणीं यथा ॥ १४<br>साश्रुनेत्रां वेपमानां सङ्क्रुध्य बालकस्तदा ।<br>भित्त्वोरुं निर्जगामाशु गर्भः सूर्य इवापरः ॥ १५<br>मुष्णन्दृष्टीः क्षत्रियाणां तेजसा बालकः शुभः ।तब दयनीय दशावाली, प्राणहीन-सी प्रतीत हो रही, आश्रयहीन, क्षत्रियोंसे पीड़ित होनेके कारण क्रन्दन करती हुई, सिंहके द्वारा पकड़ी गयी गर्भवती हिरनीके समान प्रतीत होनेवाली, आँसूभरे नेत्रोंवाली तथा थर-थर काँपती हुई माताका रुदन सुनकर वह सुन्दर गर्भस्थ बालक कुपित होकर अपने तेजसे क्षत्रियोंकी नेत्र-ज्योतिका हरण करता हुआ जंघाका भेदन करके दूसरे सूर्यकी भाँति शीघ्र ही बाहर निकल आया ॥ १३-१५ १/२ ॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 26 D