देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 721 of 889
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| ७१२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| श्रुत्वा तद् ब्रह्मणो वाक्यं दृष्ट्वा च केतकीदलम्॥ ३७<br>हरिस्तं प्रत्युवाचेदं साक्षी कः कथयाधुना।<br>यथार्थवादी मेधावी सदाचारः शुचिः समः॥ ३८<br>साक्षी भवति सर्वत्र विवादे समुपस्थिते। | ब्रह्माजीके उस वचनको सुनकर और केतकी पुष्पको देखकर विष्णुने उनसे कहा—इसका साक्षी कौन है, बताइये। किसी विवादके उपस्थित होनेपर किसी सत्यवादी, बुद्धिमान्, सदाचारी, पवित्र और निष्पक्ष व्यक्तिको साक्षी बनाया जाता है॥ ३७-३८ १/२ ॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>दूरदेशात्समायाति साक्षी कः समयेऽधुना॥ ३९ | ब्रह्माजी बोले—इस समय इतने दूर देशसे कौन साक्षी आयेगा? जो सत्य बात है, उसे यह केतकी स्वयं कह देगी॥ ३९ १/२ ॥ |
| यत्सत्यं तद्वचः सेयं केतकी कथयिष्यति।<br>इत्युक्त्वा प्रेरिता तत्र ब्रह्मणा केतकी स्फुटम्॥ ४०<br>वचनं प्राह तरसा शार्ङ्गिणं प्रत्यबोधयत्।<br>शिवमूर्ध्नि स्थितां ब्रह्मा गृहीत्वा मां समागतः॥ ४१<br>सन्देहोऽत्र न कर्तव्यस्त्वया विष्णो कदाचन।<br>मम वाक्यं प्रमाणं हि ब्रह्मा पारङ्गतोऽस्य ह॥ ४२ | ऐसा कहकर ब्रह्माजीने केतकीको [साक्ष्यके लिये] प्रेरित किया। तब उसने शीघ्रतापूर्वक विष्णुको सम्बोधित करते हुए कहा कि शिव (लिंग)के मस्तकपर स्थित मुझे ब्रह्माजी वहाँसे लेकर आये हैं। हे विष्णो! इसमें आपको किसी प्रकारका सन्देह नहीं करना चाहिये। ब्रह्माजी इस लिंगके पार गये हैं और शिवभक्तोंके द्वारा समर्पित की गयी मुझको लेकर आये हैं—यह मेरा कथन ही प्रमाण है॥ ४०—४२ १/२ ॥ |
| गृहीत्वा मां समायातः शिवभक्तैः समर्पिताम्।<br>केतक्या वचनं श्रुत्वा हरिराह स्मयन्निव॥ ४३ | केतकीकी बात सुनकर भगवान् विष्णु मुसकराते हुए बोले कि मेरे लिये तो महादेव ही प्रमाण हैं। यदि वे ऐसी बात बोल दें तो मैं मान लूँगा॥ ४३ १/२ ॥ |
| महादेवः प्रमाणं मे यद्यसौ वचनं वदेत्।<br>ऋषिरुवाच<br>तदाकर्ण्य हरेर्वाक्यं महादेवः सनातनः॥ ४४<br>कुपितः केतकीं प्राह मिथ्यावादिनि मा वद।<br>गच्छतो मध्यतः प्राप्ता पतिता मस्तकान्मम॥ ४५ | ऋषि बोले—तब विष्णुकी बात सुनकर सनातन भगवान् महादेवने क्रुद्ध होकर केतकीसे कहा—असत्यभाषिणि! ऐसा मत बोलो। मेरे मस्तकसे गिरी हुई तुझे ब्रह्मा बीचमें ही पा गये थे। तुमने झूठ बोला है, इसलिये अब मैंने सदैवके लिये तुम्हारा त्याग कर दिया। तब ब्रह्माजीने लज्जित होकर भगवान् विष्णुको नमस्कार किया। उसी दिनसे शिवद्वारा पुष्पोंमेंसे केतकीका त्याग कर दिया गया॥ ४४—४६ १/२ ॥ |
| मिथ्याभिभाषिणी त्यक्ता मया त्वं सर्वदैव हि।<br>ब्रह्मा लज्जापरो भूत्वा ननाम मधुसूदनम्॥ ४६<br>शिवेन केतकी त्यक्ता तद्दिनात्कुसुमेषु वै।<br>एवं मायाबलं विद्धि ज्ञानिनामपि मोहदम्॥ ४७<br>अन्येषां प्राणिनां राजन् का वार्ता विभ्रमं प्रति।<br>देवानां कार्यसिद्ध्यर्थं सर्वदैव रमापतिः॥ ४८ | हे राजन्! आप यह जान लीजिये कि मायाका बल ज्ञानियोंको भी मोहमें डाल देता है, तब दूसरे प्राणियोंके मोहित हो जानेकी क्या बात? स्वयं देवाधिदेव लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये पापका भय छोड़कर दैत्योंके साथ छल करते रहते हैं। वे ऐश्वर्यसम्पन्न भगवान् माधव अपने सुख और आनन्दको त्यागकर विविध योनियोंमें अवतार लेकर दैत्योंके साथ युद्ध करते हैं। देवताओंके कार्यहेतु अंशावतार ग्रहण करनेवाले सर्वज्ञ वह |