देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 722 of 889
Read in contextPage 722
| अ० ३३ ] | पञ्चम स्कन्ध | ७१३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दैत्यान्वञ्चयते चाशु त्यक्त्वा पापभयं हरिः।<br>अवतारकरो देवो नानायोनिषु माधवः॥ ४९<br>त्यक्त्वानन्दसुखं दैत्यैर्युद्धं चैवाकरोद्विभुः।<br>नूनं मायाबलं चैतन्माधवेऽपि जगद्गुरौ॥ ५०<br>सर्वज्ञे देवकार्यांशे का वार्तान्यस्य भूपते।<br>ज्ञानिनामपि चेतांसि परमा प्रकृतिः किल॥ ५१<br>बलादाकृष्य मोहाय प्रयच्छति महीपते।<br>यया व्याप्तमिदं सर्वं भगवत्या चराचरम्॥ ५२<br>मोहदा ज्ञानदा सैव बन्धमोक्षप्रदा सदा। | जगद्गुरु भगवान् विष्णुमें भी यह मायाशक्ति अपना प्रभाव डालती है, तब हे राजन्! अन्यकी क्या बात! हे राजन्! वे परम प्रकृतिस्वरूपा महामाया ज्ञानियोंके मनको भी बलपूर्वक आकृष्ट करके मोहित कर देती हैं, जिन भगवतीके द्वारा स्थावर-जंगमात्मक यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है; वे ही ज्ञानदायिनी, मोहदायिनी तथा बन्धन एवं मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं॥ ४७–५२ १/२ ॥ |
| राजोवाच<br>भगवन्ब्रूहि मे तस्याः स्वरूपं बलमुत्तमम्॥ ५३<br>उत्पत्तिकारणं वापि स्थानं परमकं च यत्। | राजा बोले— हे भगवन्! मुझे उनके स्वरूप, उत्तम बल, उनकी उत्पत्तिका कारण और उनके परम धामके विषयमें बताइये॥ ५३ १/२ ॥ |
| ऋषिरुवाच<br>न चोत्पत्तिरनादित्वान्नृप तस्याः कदाचन॥ ५४<br>नित्यैव सा परा देवी कारणानां च कारणम्।<br>वर्तते सर्वभूतेषु शक्तिः सर्वात्मना नृप॥ ५५<br>शववच्छक्तिहीनस्तु प्राणी भवति सर्वथा।<br>चिच्छक्तिः सर्वभूतेषु रूपं तस्यास्तदेव हि॥ ५६<br>आविर्भावतिरोभावौ देवानां कार्यसिद्धये। | ऋषि बोले— हे राजन्! अनादि होनेके कारण उनकी कभी उत्पत्ति नहीं होती। नित्य और सर्वोपरि वे देवी समस्त कारणोंकी भी कारण हैं। हे नृप! वे शक्तिस्वरूपा भगवती सभी प्राणियोंमें सर्वात्मारूपसे विद्यमान रहती हैं। यदि प्राणी शक्तिसे रहित हो जाय तो वह प्राणी शवतुल्य हो जाता है; क्योंकि सभी प्राणियोंमें जो चैतन्य शक्ति है, वह इन्हींका रूप है। देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये ही उनका प्राकट्य और तिरोधान होता है॥ ५४–५६ १/२ ॥ |
| यदा स्तुवन्ति तां देवा मनुजाश्च विशाम्पते॥ ५७<br>प्रादुर्भवति भूतानां दुःखनाशाय चाम्बिका।<br>नानारूपधरा देवी नानाशक्तिसमन्विता॥ ५८<br>आविर्भवति कार्यार्थं स्वेच्छया परमेश्वरी।<br>दैवाधीना न सा देवी यथा सर्वे सुरा नृप॥ ५९ | हे राजन्! जब देवता या मनुष्य उनकी स्तुति करते हैं, तब प्राणियोंके दुःखका नाश करनेके लिये ये भगवती जगदम्बा प्रकट होती हैं, वे देवी परमेश्वरी अनेक रूप धारण करके अनेक प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न होकर कार्य सिद्ध करनेके लिये स्वेच्छापूर्वक आविर्भूत होती हैं। हे राजन्! अन्य देवताओंकी भाँति वे भगवती दैवके अधीन नहीं हैं। सदा पुरुषार्थका प्रवर्तन करनेवाली वे देवी कालके वशमें नहीं हैं॥ ५७–५९ १/२ ॥ |
| न कालवशगा नित्यं पुरुषार्थप्रवर्तिनी।<br>अकर्ता पुरुषो द्रष्टा दृश्यं सर्वमिदं जगत्॥ ६०<br>दृश्यस्य जननी सैव देवी सदसदात्मिका।<br>पुरुषं रञ्जयत्येका कृत्वा ब्रह्माण्डनाटकम्॥ ६१<br>रञ्जिते पुरुषे सर्वं संहरत्यतिरंहसा।<br>तया निमित्तभूतास्ते ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः॥ ६२ | यह सम्पूर्ण जगत् दृश्य है, परमपुरुष इसका द्रष्टा है, वह कर्ता नहीं है। वे सत्-असत्स्वरूपा देवी ही इस दृश्यमान जगत्की जननी हैं, वे स्वयं अकेले इस ब्रह्माण्डकी रचना करके परमपुरुषको आनन्दित करती हैं और उन परमपुरुषका मनोरंजन हो जानेके बाद वे भगवती शीघ्र ही सम्पूर्ण सृष्टि-प्रपंचका संहार भी कर देती हैं। वे ब्रह्मा, विष्णु और महेश तो निमित्तमात्र हैं। वे भगवती ही अपनी लीलासे |