देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 720 of 889
Read in contextPage 720
| अ० ३३] | पञ्चम स्कन्ध | ७११ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मया त्वं रक्षितोऽद्यैव कृत्वा युद्धं सुदारुणम्।<br>शरणं मे समायातो दानवाभ्यां प्रपीडितः॥ २३<br>मया तौ निहतौ कामं दानवौ मधुकैटभौ।<br>कथं गर्वायसे मन्द मोहोऽयं त्यज साम्प्रतम्॥ २४<br>न मत्तोऽप्यधिकः कश्चित्संसारेऽस्मिन्नसारिते। | दोनों दानवों (मधु-कैटभ)-के द्वारा पीड़ित किये जानेपर तुम मेरी ही शरणमें आये थे, उस समय अत्यन्त भीषण युद्ध करके मैंने तुम्हारी रक्षा की। मैंने ही उन मधु-कैटभ दानवोंका वध किया है, अतः हे मन्दबुद्धि! तुम क्यों गर्व करते हो? यह तुम्हारा अज्ञान है, इसका शीघ्र त्याग कर दो; क्योंकि इस सम्पूर्ण संसारमें मुझसे बढ़कर कोई नहीं है॥ २३-२४ १/२ ॥ |
| ऋषिरुवाच<br>एवं प्रवदमानौ तौ ब्रह्मविष्णू परस्परम्॥ २५<br>स्फुरदोष्ठौ वेपमानौ लोहिताक्षौ बभूवतुः।<br>प्रादुर्बभूव सहसा तयोर्विवदमानयोः॥ २६<br>मध्ये लिङ्गं सुधाश्वेतं विपुलं दीर्घमद्भुतम्।<br>आकाशे तरसा तत्र वागुवाचाशरीरिणी॥ २७<br>तौ सम्बोध्य महाभागौ विवदन्तौ परस्परम्।<br>ब्रह्मन् विष्णो विवादं मा कुरुतां वां परस्परम्॥ २८ | ऋषि बोले— इस प्रकार परस्पर विवाद करते हुए उन दोनों—ब्रह्मा-विष्णुके ओठ फड़कने लगे, वे क्रोधमें काँपने लगे और उनकी आँखें रक्तवर्ण हो गयीं। तभी विवादरत उन दोनोंके मध्य अचानक एक श्वेतवर्ण, अत्यन्त विशाल तथा अद्भुत लिंग प्रकट हो गया। तदनन्तर विवाद करते हुए उन दोनों महानुभावोंको सम्बोधित करके आकाशवाणी हुई—हे ब्रह्मन्! हे विष्णो! तुम दोनों परस्पर विवाद मत करो॥ २५-२८॥ |
| लिङ्गस्यास्य परं पारमधस्तादुपरि ध्रुवम्।<br>यो याति युवयोर्मध्ये स श्रेष्ठो वां सदैव हि॥ २९<br>एकः प्रयातु पातालमाकाशमपरोऽधुना।<br>प्रमाणं मे वचः कार्यं त्यक्त्वा वादं निरर्थकम्॥ ३०<br>मध्यस्थः सर्वदा कार्यों विवादेऽस्मिन्द्वयोरिह। | इस लिंगके ऊपरी या निचले छोरका आप दोनोंमेंसे जो पता लगा लेगा, आप दोनोंमें वह सदैवके लिये श्रेष्ठ हो जायगा। इसलिये मेरी वाणीको प्रमाण मानकर तथा इस निरर्थक विवादका त्यागकर आपलोगोंमेंसे एक आकाश और दूसरा पातालकी ओर अभी जाय। इस विवादमें आप दोनोंको एक मध्यस्थ भी अवश्य कर लेना चाहिये॥ २९-३० १/२ ॥ |
| ऋषिरुवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं दिव्यं सज्जीभूतौ कृतोद्यमौ॥ ३१<br>जग्मतुर्मातुमग्रस्थं लिङ्गमद्भुतदर्शनम्।<br>पातालमगमद्विष्णुर्ब्रह्माप्याकाशमेव च॥ ३२<br>परिमातुं महालिङ्गं स्वमहत्त्वविवृद्धये। | ऋषि बोले— उस दिव्य वाणीको सुनकर वे दोनों चेष्टापूर्वक उद्यम करनेके लिये तैयार हो गये और अपने समक्ष स्थित उस देखनेमें अद्भुत लिंगको मापनेके लिये चल पड़े। अपने-अपने महत्त्वकी वृद्धिके लिये उस महालिंगको नापनेहेतु विष्णु पातालकी ओर और ब्रह्मा आकाशकी ओर गये॥ ३१-३२ १/२ ॥ |
| विष्णुर्गत्वा कियद्देशं श्रान्तः सर्वात्मना यतः॥ ३३<br>न प्रापान्तं स लिङ्गस्य परिवृत्य ययौ स्थलम्।<br>ब्रह्मागच्छत्ततश्चोर्ध्वं पतितं केतकीदलम्॥ ३४<br>शिवस्य मस्तकात्प्राप्य परावृत्तो मुदावृतः। | कुछ दूरतक जानेपर विष्णु पूर्णरूपसे थक गये। वे लिंगका अन्त नहीं प्राप्त कर सके और तब उसी स्थलपर वापस लौट आये। ब्रह्माजी ऊपरकी ओर गये और शिवके मस्तकसे गिरे हुए केतकी पुष्पको लेकर वे भी प्रसन्न हो लौट आये॥ ३३-३४ १/२ ॥ |
| आगत्य तरसा ब्रह्मा विष्णवे केतकीदलम्॥ ३५<br>दर्शयित्वा च वितथमुवाच मदमोहितः।<br>लिङ्गस्य मस्तकादेतद् गृहीतं केतकीदलम्॥ ३६<br>अभिज्ञानाय चानीतं तव चित्तप्रशान्तये। | तब अहंकारसे मोहित ब्रह्मा शीघ्रतापूर्वक आकर विष्णुको केतकी पुष्प दिखाकर यह झूठ बोलने लगे कि मैंने यह केतकी पुष्प इस लिंगके मस्तकसे प्राप्त किया है। आपके चित्तकी शान्तिके लिये पहचानचिह्नके रूपमें मैं इसे लेता आया हूँ॥ ३५-३६ १/२ ॥ |