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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 719 of 889

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Page 719
७१०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३३

| ऋषिरुवाच | ऋषि बोले— हे राजन्! सुनिये, मैं बताता हूँ। |
| शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि कारणं बन्धमोक्षयोः ॥ ९<br>महामायेति विख्याता सर्वेषां प्राणिनामिह ।<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथेशानस्तुराषाड् वरुणोऽनिलः ॥ १०<br>सर्वे देवा मनुष्याश्च गन्धर्वोरगराक्षसाः ।<br>वृक्षाश्च विविधा वल्ल्यः पशवो मृगपक्षिणः ॥ ११<br>मायाधीनाश्च ते सर्वे भाजनं बन्धमोक्षयोः ।<br>तया सृष्टमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ १२<br>तद्वशे वर्तते नूनं मोहजालेन यन्त्रितम् ।<br>त्वं कियान्मानुषेष्वेकः क्षत्रियो रजसाविलः ॥ १३ | महामायाके नामसे विख्यात वे भगवती ही सभी प्राणियोंके बन्धन और मोक्षकी कारण हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र, वरुण, पवन आदि सभी देवता, मनुष्य, गन्धर्व, सर्प, राक्षस, वृक्ष, विविध लताएँ, पशु, मृग और पक्षी—ये सब मायाके अधीन हैं और बन्धन तथा मोक्षके भाजन हैं। उन महामायाने ही इस जड़-चेतनमय सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की है। जब यह जगत् सदा उन्हींके अधीन रहता है और मोहजालमें जकड़ा हुआ है, तब आप किस गणनामें हैं? आप तो मनुष्योंमें रजोगुणसे युक्त एक क्षत्रियमात्र हैं॥ ९–१३॥ |
| ज्ञानिनामपि चेतांसि मोहयत्यनिशं हि सा ।<br>ब्रह्मेशवासुदेवाद्या ज्ञाने सत्यपि शेषतः ॥ १४<br>तेऽपि रागवशाल्लोके भ्रमन्ति परिमोहिताः । | वे महामाया ज्ञानियोंकी बुद्धिको भी सदा मोहित किये रहती हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदि परम ज्ञानी होते हुए भी रागके वशीभूत होकर व्यामोहमें पड़ जाते हैं और संसारमें चक्कर काटा करते हैं॥ १४ १/२॥ |
| पुरा सत्ययुगे राजन् विष्णुर्नारायणः स्वयं ॥ १५<br>श्वेतद्वीपं समासाद्य चकार विपुलं तपः ।<br>वर्षाणामयुतं यावद् ब्रह्मविद्याप्रसक्तये ॥ १६<br>अनश्वरसुखायासौ चिन्तयानस्ततः परम् ।<br>एकस्मिन्निर्जने देशे ब्रह्मापि परमाद्भुते ॥ १७<br>स्थितस्तपसि राजेन्द्र मोहस्य विनिवृत्तये । | हे राजन्! प्राचीन कालमें स्वयं उन भगवान् नारायणने ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति तथा अविनाशी सुखके लिये श्वेतद्वीपमें जाकर ध्यान करते हुए दस हजार वर्षोंतक घोर तपस्या की थी। हे राजेन्द्र! इसके साथ ही मोहकी निवृत्तिकाके लिये एक निर्जन प्रदेशमें ब्रह्माजी भी परम अद्भुत तपस्यामें संलग्न हो गये॥ १५–१७ १/२॥ |
| कदाचिद्वासुदेवोऽसौ स्थलान्तरमतिर्हरिः ॥ १८<br>तस्माद्देशात्समुत्थाय जगामान्यद्दिदृक्षया ।<br>चतुर्मुखोऽपि राजेन्द्र तथैव निःसृतः स्थलात् ॥ १९<br>मिलितौ मार्गमध्ये तु चतुर्मुखचतुर्भुजौ ।<br>अन्योन्यं पृष्टवन्तौ तौ कस्त्वं कस्त्वमिति स्म ह ॥ २० | हे राजेन्द्र! किसी समय वासुदेव भगवान् श्रीहरिने दूसरे स्थानपर जानेका विचार किया और वे उस स्थानसे उठकर अन्य स्थलको देखनेकी इच्छासे चल दिये। ब्रह्माजी भी उसी प्रकार अपने स्थानसे निकल पड़े। चतुर्मुख ब्रह्माजी और चतुर्भुज भगवान् विष्णु मार्गमें मिल गये। तब वे दोनों एक-दूसरेसे पूछने लगे—तुम कौन हो, तुम कौन हो? ॥ १८–२०॥ |
| ब्रह्मा प्रोवाच तं देवं कर्ताहं जगतः किल ।<br>विष्णुस्तमाह भो मूर्ख जगत्कर्ताहमच्युतः ॥ २१<br>त्वं कियान्बलहीनोऽसि रजोगुणसमाश्रितः ।<br>सत्त्वाश्रितं हि मां विद्धि वासुदेवं सनातनम् ॥ २२ | ब्रह्माजी भगवान् विष्णुसे बोले—मैं जगत्का स्रष्टा हूँ। तब विष्णुने उनसे कहा—हे मूर्ख! अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाला मैं विष्णु ही जगत्का कर्ता हूँ। तुम कितने शक्तिशाली हो? तुम तो रजोगुणयुक्त और बलहीन हो! मुझे सत्त्वगुणसम्पन्न सनातन नारायण जानो॥ २१-२२॥ |