देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 718 of 889
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अ० ३३] पञ्चम स्कन्ध [७०९
| गत्वा तं प्रणिपत्याह राजा ऋषिमनुत्तमम्।<br><br>आसीनं सम्यगासीनः शान्तं शान्तिमुपागतः॥ ६३ | वहाँ जाकर राजा सुरथ आसन लगाकर शान्त बैठे हुए मुनिश्रेष्ठको प्रणाम करके स्वयं भी सम्यक् रूपसे आसनपर बैठकर शान्तिपूर्वक उनसे कहने लगे॥ ६३॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितयां पञ्चमस्कन्धे सुरथराजसमाधि-<br>वैश्ययोर्मुनिंसमीपे गमनं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः॥ ३२॥
अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः
मुनि सुमेधाका सुरथ और समाधिको देवीकी महिमा बताना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| राजोवाच<br>मुने वैश्योऽयमधुना वने मे मित्रतां गतः।<br>पुत्रदारैर्निरस्तोऽयं प्राप्तोऽत्र मम सङ्गमम्॥ १<br>(कुटुम्बविरहेणासौ दुःखितोऽतीव दुर्मनाः।<br>न शान्तिमुपयात्येष तथापि मम साम्प्रतम्।<br>गतराज्यस्य दुःखेन शोकार्तोऽस्मि महामते।)<br>निष्कारणञ्च मे चिन्ता हृदयान्न निवर्तते।<br>हया मे दुर्बलाः स्युः किं गजाः शत्रुवशं गताः॥ २<br>भृत्यवर्गस्तथा दुःखी जातः स्यात्तु मया विना।<br>कोशक्षयं करिष्यन्ति रिपवोऽतिबलात्क्षणात्॥ ३<br>इत्येवं चिन्तयानस्य न मे निद्रा तनौ सुखम्।<br>जानामीदं जगन्मिथ्या स्वप्नवत्सर्वमेव हि॥ ४<br>जानतोऽपि मनो भ्रान्तं न स्थिरं भवति प्रभो।<br>कोऽहं केऽश्वा गजाः केऽमी न ते मे च सहोदराः॥ ५<br>न पुत्रा न च मित्राणि येषां दुःखं दुनोति माम्।<br>भ्रमोऽयमिति जानामि तथापि मम मानसः॥ ६<br>मोहो नैवापसरति किं तत्कारणमद्भुतम्।<br>स्वामिंस्त्वमसि सर्वज्ञः सर्वसंशयनाशकृत्॥ ७<br>कारणं ब्रूहि मोहस्य ममास्य च दयानिधे। | राजा बोले—हे मुने! ये वैश्य हैं, आज ही वनमें इनसे मेरी मित्रता हुई है। पत्नी और पुत्रोंने इन्हें निकाल दिया है और अब यहाँ इन्हें मेरा साथ प्राप्त हुआ है॥ १॥<br>(परिवारके वियोगसे ये अत्यन्त दुःखी और विक्षुब्ध हैं; इन्हें शान्ति नहीं मिल पा रही है और इस समय मेरी भी ऐसी ही स्थिति है। हे महामते! राज्य चले जानेके दुःखसे मैं शोकसन्तप्त हूँ।) व्यर्थकी यह चिन्ता मेरे हृदयसे निकल नहीं रही है—मेरे घोड़े दुर्बल हो गये होंगे और हाथी शत्रुओंके अधीन हो गये होंगे। उसी प्रकार सेवकगण भी मेरे बिना दुःखी रहते होंगे। शत्रुगण राजकोशको क्षणभरमें बलपूर्वक रिक्त कर देंगे॥ २-३॥<br>इस प्रकार चिन्ता करते हुए मुझे न निद्रा आती है और न मेरे शरीरको सुख मिलता है। मैं जानता हूँ कि यह सम्पूर्ण जगत् स्वप्नकी भाँति मिथ्या है, किंतु हे प्रभो! यह जानते हुए भी मेरा भ्रमित मन स्थिर नहीं होता। मैं कौन हूँ? ये हाथी-घोड़े कौन हैं? ये मेरे कोई सगे-सम्बन्धी भी नहीं हैं। न ये मेरे पुत्र हैं, और न मेरे मित्र हैं, जिनका दुःख मुझे पीड़ित कर रहा है। मैं जानता हूँ कि यह भ्रम है, फिर भी मेरे मनसे सम्बन्ध रखनेवाला मोह दूर नहीं होता, यह बड़ा ही अद्भुत कारण है! हे स्वामिन्! आप सर्वज्ञ और सभी संशयोंका नाश करनेवाले हैं, अतः हे दयानिधे! मेरे इस मोहका कारण बतायें॥ ४-७ ½ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इति पृष्टस्तदा राज्ञा सुमेधा मुनिसत्तमः॥ ८<br>तमुवाच परं ज्ञानं शोकमोहविनाशनम्। | व्यासजी बोले—तब राजाके ऐसा पूछनेपर मुनिश्रेष्ठ सुमेधा उनसे शोक और मोहका नाश करनेवाले परम ज्ञानका वर्णन करने लगे॥ ८ ½ ॥ |