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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 717 of 889

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Page 717

| ७०८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३२ |
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राजोवाचराजा बोले—
सुरथो नाम राजाहं दस्युभिः पीडितोऽभवम्॥ ५२<br><br>प्राप्तोऽस्मि गतराज्यॊऽत्र मन्त्रिभिः परिवञ्चितः।<br>दिष्ट्या त्वमत्र मित्रं मे मिलितोऽसि विशोत्तम॥ ५३<br><br>सुखेन विहरिष्यावो वनेऽत्र शुभपादपे।<br>शोकं त्यज महाबुद्धे स्वस्थो भव विशोत्तम॥ ५४<br>( अत्रैव च यथाकामं सुखं तिष्ठ मया सह।)मैं सुरथ नामका राजा हूँ, मैं दस्युओंसे पीड़ित हूँ। मन्त्रियोंके द्वारा ठगे जानेके कारण राज्यविहीन होकर मैं यहाँ आया हूँ। हे वैश्यश्रेष्ठ! भाग्यवश आप मुझे यहाँ मित्रके रूपमें मिल गये हैं। अब हम दोनों सुन्दर वृक्षोंसे युक्त इस वनमें विहार करेंगे। हे महाबुद्धिमान् वैश्यश्रेष्ठ! चिन्ता छोड़िये और प्रसन्नचित्त होइये (अब आप मेरे साथ यहींपर इच्छानुसार सुखपूर्वक रहिये)॥ ५२—५४॥
वैश्य उवाच<br>कुटुम्बं मे निरालम्बं मया हीनं सुदुःखितम्।<br>भविष्यति च चिन्तार्तं व्याधिशोकोपतापितम्॥ ५५वैश्य बोला—मेरा परिवार आश्रयरहित है, मेरे बिना परिवारके लोग अत्यन्त दुःखी होंगे। मेरे बारेमें चिन्ता करते हुए वे रोग तथा शोकसे व्याकुल हो जायँगे॥ ५५॥
भार्यादेहे सुखं नो वा पुत्रदेहे न वा सुखम्।<br>इति चिन्तातुरं चेतो न मे शाम्यति भूमिप॥ ५६हे राजन्! मेरी पत्नी तथा पुत्र शारीरिक सुख पा रहे होंगे अथवा नहीं, इसी चिन्तासे व्याकुल रहनेके कारण मेरा मन शान्त नहीं रह पाता॥ ५६॥
कदा द्रक्ष्ये सुतं भार्यां गृहं स्वजनमेव च।<br>स्वस्थं न मन्मनो राजन् गृहचिन्ताकुलं भृशम्॥ ५७हे राजन्! मैं पुत्र, पत्नी, घर और स्वजनोंको कब देख सकूँगा? गृहकी चिन्तासे अत्यन्त व्याकुल मेरा मन स्वस्थ नहीं हो पाता है॥ ५७॥
राजोवाच<br>यैर्निरस्तोऽसि पुत्राद्यैरसद्वृत्तैः सुबालिशैः।<br>तान्दृष्ट्वा किं सुखं तेऽद्य भविष्यति महामते॥ ५८<br><br>हितकारी वरः शत्रुदुर्दुःखदाः सुहृदः कुतः।<br>तस्मात्स्थिरं मनः कृत्वा विहरस्व मया सह॥ ५९राजा बोले—हे महामते! जिन दुराचारी तथा महामूर्ख पुत्र आदिके द्वारा आप घरसे निकाल दिये गये, उन्हें देखकर अब आपको कौन-सा सुख मिलेगा? दुःख देनेवाले सुहृदोंकी अपेक्षा सुख देनेवाला शत्रु श्रेष्ठ है; अतः अपने मनको स्थिर करके आप मेरे साथ आनन्द कीजिये॥ ५८-५९॥
वैश्य उवाच<br>मनो मे न स्थिरं राजन् भवत्यद्य सुदुःखितम्।<br>चिन्तयात्र कुटुम्बस्य दुस्त्यजस्य दुरात्मभिः॥ ६०वैश्य बोला—हे राजन्! दुर्जनोंके द्वारा भी अत्यन्त कठिनतासे त्यागे जानेवाले कुटुम्बकी चिन्तासे अत्यन्त दुःखित मेरा मन इस समय स्थिर नहीं हो पा रहा है॥ ६०॥
राजोवाच<br>ममापि राज्यजं दुःखं दुनोति किल मानसम्।<br>पृच्छावोऽद्य मुनिं शान्तं शोकनाशनमौषधम्॥ ६१राजा बोले—राज्यसम्बन्धी चिन्ता मेरे मनको भी दुःखी करती रहती है। अतः अब हम दोनों शान्त प्रकृतिवाले मुनिसे शोकके नाशकी औषधि पूछें॥ ६१॥
व्यास उवाच<br>इति कृत्वा मतिं तौ तु राजा वैश्यश्च जग्मतुः।<br>मुनिं तौ विनयोपेतौ प्रष्टुं शोकस्य कारणम्॥ ६२व्यासजी बोले—ऐसा विचार करके राजा और वैश्य—दोनों ही अत्यन्त विनम्र होकर शोकका कारण पूछनेके लिये मुनिके पास गये॥ ६२॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—23 D