देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 716 of 889
Read in contextPage 716
| अ० ३२ ] | पञ्चम स्कन्ध | ७०७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| गजाश्च तुरगाः सर्वे दुर्बला भक्ष्यवर्जिताः।<br>जाताः स्युर्र्नात्र सन्देहः शत्रुणा परिपीडिताः॥ ४२ | मेरे सभी हाथी तथा घोड़े आहार न पाने तथा शत्रुसे प्रताड़ित किये जानेके कारण अत्यन्त दुर्बल हो गये होंगे; इसमें तो कोई सन्देह नहीं है॥ ४२॥ |
| सेवका मम सर्वे ते शत्रूणां वशवर्तिनः।<br>दुःखिता एव जाताः स्युः पालिता ये मया पुरा॥ ४३ | अपने जिन सेवकोंका मैंने पहले पालन-पोषण किया था, वे सब शत्रुओंके अधीन हो जानेके कारण कष्टका अनुभव करते होंगे॥ ४३॥ |
| धनं मे सुदुराचारैरसद्व्ययपरैः परैः।<br>द्यूतासवभुजिष्यादिस्थाने स्यात्प्रापितं किल॥ ४४ | उन अति दुराचारी तथा अपव्यय करनेके स्वभाववाले शत्रुओंने मेरा धन द्यूत, मदिरालय एवं वेश्यालयोंमें निश्चित-रूपसे खर्च कर दिया होगा॥ ४४॥ |
| कोशक्षयं करिष्यन्ति व्यसनैः पापबुद्धयः।<br>न पात्रदाननिपुणा म्लेच्छास्ते मन्त्रिणोऽपि मे॥ ४५ | वे पापबुद्धि मेरा समस्त राजकोष व्यसनोंमें नष्ट कर डालेंगे, सत्पात्रोंको दान देनेकी योग्यता भी उन म्लेच्छोंमें नहीं है और मेरे मन्त्री भी अधीनतामें रहनेके कारण उन्हींके जैसे हो गये होंगे॥ ४५॥ |
| इति चिन्तापरो राजा वृक्षमूलस्थितो यदा।<br>तदाजगाम वैश्यस्तु कश्चिदार्तिपरस्तथा॥ ४६ | महाराज सुरथ वृक्षके नीचे बैठकर इसी चिन्तामें पड़े हुए थे कि उसी समय एक विषादग्रस्त वैश्य वहाँ आ पहुँचा॥ ४६॥ |
| नृपेण पुरतो दृष्टः पार्श्वे तत्रोपवेशितः।<br>पप्रच्छ तं नृपः कोऽसि कुत एवागतो वनम्॥ ४७<br><br>कोऽसि कस्माच्च दीनोऽसि हरिणः शोकपीडितः।<br>ब्रूहि सत्यं महाभाग मैत्री साप्तपदी मता॥ ४८ | राजाने उस वैश्यको सामने देख लिया। उन्होंने उसे अपने समीपमें बैठा लिया और पुनः उससे पूछा—आप कौन हैं तथा इस वनमें कहाँसे आये हैं? आप कौन हैं, आप उदास क्यों हैं? चिन्ताग्रस्त रहनेके कारण आप तो पीले वर्णके हो गये हैं? हे महाभाग! सात पग एक साथ चलनेपर ही मैत्री समझ ली जाती है, अतः आप मुझे सब कुछ सच-सच बता दीजिये॥ ४७-४८॥ |
| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञस्तमुवाच विशोत्तमः।<br>उपविश्य स्थिरो भूत्वा मत्वा साधुसमागमम्॥ ४९ | व्यासजी बोले—राजाका वचन सुनकर वह वैश्यश्रेष्ठ उनके पास बैठ गया और इसे सज्जनसमागम समझकर शान्तचित्त होकर उनसे कहने लगा॥ ४९॥ |
| वैश्य उवाच<br>मित्राहं वैश्यजातीयः समाधिर्नाम विश्रुतः।<br>धनवान्धर्मनिपुणः सत्यवागनसूयकः॥ ५०<br><br>पुत्रदारैर्निरस्तोऽहं धनलुब्धैरर्साधुभिः।<br>(कृपणेति मिषं कृत्वा त्यक्त्वा मायां सुदुस्त्यजाम्।)<br>स्वजनेन च संत्यक्तः प्राप्तोऽस्मि वनमाशु वै॥ ५१<br>कोऽसि त्वं भाग्यवान्भासि कथयस्व प्रियाधुना। | वैश्य बोला—हे मित्र! मैं वैश्यजातिमें उत्पन्न हूँ और समाधि नामसे प्रसिद्ध हूँ। मैं धनवान्, धर्मकार्योंमें निपुण, सत्यवादी और ईर्ष्यासे रहित हूँ, फिर भी धनके लोभी और कुटिल स्त्री-पुत्रोंने मुझे घरसे निकाल दिया (उन्होंने मुझे कृपण कहकर कठिनाईसे टूटनेवाला माया-बन्धन भी तोड़ दिया), अतः अपने कुटुम्बियोंसे परित्यक्त होकर मैं अभी-अभी इस वनमें आया हूँ। हे प्रिय! आप कौन हैं? मुझे बतायें; आप भाग्यवान् प्रतीत होते हैं॥ ५०-५१ १/२॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—23 C