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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 715 of 889

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Page 715

७०६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३२

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते तमुवाच तदा मुनिः।<br>शिष्यो ददौ बृसीं तस्मै गुरुणा नोदितस्तदा॥ ३०तब मुनिने उनसे कहा—उठिये-उठिये, आपका कल्याण हो। तत्पश्चात् गुरुसे आदेश पाकर एक शिष्यने उन्हें आसन प्रदान किया॥ ३०॥
उत्थाय नृपतिस्तस्यां समासीनस्तदाज्ञया।<br>अर्घ्यपाद्यार्हणं चक्रे सुमेधा विधिपूर्वकम्॥ ३१<br><br>पप्रच्छात्र कुतः प्राप्तः कस्त्वं चिन्तापरः कथम्।<br>कथयस्व यथाकामं संवृतं कारणं त्विह॥ ३२<br><br>किमागमनकृत्यं ते ब्रूहि कार्यं मनोगतम्।<br>करिष्ये वाञ्छितं काममसाध्यमपि यत्तव॥ ३३तब वे उठकर मुनिसे आज्ञा लेकर उस आसनपर बैठ गये। इसके बाद सुमेधाऋषिने अर्घ्य-पाद्य आदिसे उनका विधिपूर्वक सत्कार किया। मुनिने उनसे पूछा कि आप यहाँ कहाँसे आये हैं? आप कौन हैं तथा चिन्तित क्यों हैं? यहाँ आनेका जो भी कारण हो, उसे आप यथारुचि बतायें। आपके आगमनका प्रयोजन क्या है? आप अपने मनके विचारोंको अवश्य बताइये। आपका कोई असाध्य मनोरथ होगा तो उसे भी मैं पूर्ण करूँगा॥ ३१–३३॥
राजोवाच<br>सुरथो नाम राजाहं शत्रुभिश्च पराजितः।<br>त्यक्त्वा राज्यं गृहं भार्यामहं ते शरणं गतः॥ ३४<br><br>यदाज्ञापयसे ब्रह्मंस्तदहं भक्तितत्परः।<br>करिष्यामि न मे त्राता त्वदन्यः पृथिवीतले॥ ३५<br><br>शत्रुभ्यो मे भयं घोरं प्राप्तोऽस्म्यद्य तवान्तिकम्।<br>त्रायस्व मुनिशार्दूल शरणागतवत्सल॥ ३६राजा बोले—मैं सुरथ नामवाला राजा हूँ। शत्रुओंसे पराजित होकर मैं राज्य, महल तथा स्त्री—सब कुछ छोड़कर आपकी शरणमें आया हूँ॥ ३४॥<br><br>हे ब्रह्मन्! अब आप मुझे जो भी आज्ञा देंगे, मैं श्रद्धापूर्वक वही करूँगा। इस पृथ्वीतलपर आपके अतिरिक्त अब कोई दूसरा मेरा रक्षक नहीं है॥ ३५॥<br><br>हे मुनिराज! हे शरणागतवत्सल! शत्रुओंसे मुझे महान् भय उपस्थित है, अतएव मैं आपके पास आया हूँ; अब आप मेरी रक्षा कीजिये॥ ३६॥
ऋषिरुवाच<br>निर्भयं वस राजेन्द्र नात्र ते शत्रवः किल।<br>आगमिष्यन्ति बलिनो निश्चयं तपसो बलात्॥ ३७<br><br>नात्र हिंसा प्रकर्तव्या वनवृत्त्या नृपोत्तम।<br>कर्तव्यं जीवनं शस्तैर्नीवारफलमूलकैः॥ ३८ऋषि बोले—हे राजेन्द्र! आप निर्भीक होकर यहाँ रहिये। यह निश्चित है कि मेरी तपस्याके प्रभावसे आपके पराक्रमी शत्रु यहाँ नहीं आ सकेंगे॥ ३७॥<br><br>हे नृपश्रेष्ठ! यहाँपर आपको हिंसा नहीं करनी चाहिये और वनवासियोंकी भाँति पवित्र नीवार तथा फल-मूल आदिके द्वारा जीवन-निर्वाह करना चाहिये॥ ३८॥
व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा निर्भयः स नृपस्तदा।<br>उवासाश्रम एवासौ फलमूलाशनः शुचिः॥ ३९<br><br>कदाचित्स नृपस्तत्र वृक्षच्छायां समाश्रितः।<br>चिन्तयामास चिन्तार्तो गृह एव गताशयः॥ ४०<br><br>राज्यं मे शत्रुभिः प्राप्तं म्लेच्छैः पापरतैः सदा।<br>सम्पीडिताः स्युर्लोकास्तैर्दुराचारैर्गतत्रपैः॥ ४१व्यासजी बोले—तब मुनिकी यह बात सुनकर राजा सुरथ निर्भय हो गये। अब वे फल-मूलका आहार करते हुए पवित्रताके साथ उस आश्रममें ही रहने लगे॥ ३९॥<br><br>किसी समय उस आश्रममें एक वृक्षकी छायामें बैठे हुए चिन्ताकुल राजा सुरथका चित्त घरकी ओर चला गया और वे सोचने लगे—॥४०॥<br><br>निरन्तर पापकर्ममें लगे रहनेवाले म्लेच्छ शत्रुओंने मेरा राज्य छीन लिया है। उन दुराचारी तथा निर्लज्ज म्लेच्छोंके द्वारा मेरी प्रजा बहुत सतायी जाती होगी॥ ४१॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—23 B